भाद्रपद शुक्ल पार्श्व (पद्मा/परिवर्तिनी) एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ और मंगलाचरण
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
परम पावन नैमिषारण्य तीर्थ में, जहाँ अट्ठासी हजार शौनकादि ऋषि ज्ञान-पिपासा से एकत्र हुए थे, वहाँ सूतजी महाराज ने पुराणों की सुधा का पान कराते हुए इस अत्यंत गुह्य और कल्याणकारी कथा का आरंभ किया। सूतजी महाराज कहते हैं— हे ऋषियों! एकादशी का व्रत समस्त पापों के ईंधनों को भस्म करने वाला, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला और भगवान श्रीहरि के श्रीचरणों में अहैतुकी भक्ति प्रदान करने वाला परम साधन है。
द्वापर युग के अंत में, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में प्रश्न किया था, तब जो अत्यंत गूढ़, रहस्यमयी और कल्याणकारी कथा भगवान ने उन्हें सुनाई थी, वही पारंपरिक कथा मैं आप सबके समक्ष ज्यों-की-त्यों पूर्ण विस्तार के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस कथा में लेशमात्र भी आधुनिकता या मानव-कल्पित विचार का समावेश नहीं है, अपितु यह विशुद्ध रूप से श्री वेदव्यास जी द्वारा रचित 'पद्म पुराण', 'भविष्य पुराण' और 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के मूल वचनों पर आधारित है ।
धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
महाराज युधिष्ठिर, जो साक्षात धर्म के अवतार और सत्य के रक्षक थे, उन्होंने हाथ जोड़कर, मस्तक नवाकर अत्यंत विनयपूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
"हे माधव! हे मधुसूदन! हे त्रिलोकीनाथ! हे कमलनयन! आप संपूर्ण जगत के पालनहार और जीवों के परम आश्रय हैं। मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु! मेरी जिज्ञासा है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस परम पावन दिन किस देवता का पूजन किया जाता है? उस व्रत का क्या विधान है और उसे धारण करने से किस पुण्य फल की प्राप्ति होती है? हे जगन्नाथ! आप कृपा करके इस एकादशी का संपूर्ण माहात्म्य मुझसे विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके श्रीमुख से कथा श्रवण करने से मेरी तृप्ति नहीं होती और मेरा मन बारंबार आपके दिव्य वचनों को सुनने के लिए लालायित रहता है।"
श्रीकृष्ण द्वारा पार्श्व (पद्मा) एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के इन भक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण का मुखमंडल प्रसन्नता से खिल उठा। भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत मधुर और गंभीर वाणी में कहा—
"हे राजन्! हे युधिष्ठिर! तुमने संपूर्ण लोकों के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम और लोकोपकारी प्रश्न किया है। इस कथा के श्रवण मात्र से ही बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है और मनुष्य को वाजपेय तथा हजार अश्वमेध यज्ञों के समान फल की प्राप्ति होती है ।
हे पाण्डुनंदन! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस परम पावन एकादशी को 'पार्श्व एकादशी', 'पद्मा एकादशी', 'परिवर्तिनी एकादशी', 'जलझूलनी एकादशी' तथा 'वामन एकादशी' के नाम से जाना जाता है । इस दिन तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में शयन करते हुए करवट बदलते हैं, इसलिए इसे 'परिवर्तिनी' या 'पार्श्व' एकादशी कहते हैं। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के वामन अवतार का पूजन किया जाता है ।
हे राजन्! इस एकादशी के विषय में दो अत्यंत पावन और प्राचीन कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। पहली कथा वह है जो स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने देवर्षि नारद को सुनाई थी, जिसका विस्तृत वर्णन 'पद्म पुराण' में प्राप्त होता है । दूसरी कथा भगवान वामन और दैत्यराज बलि की है, जिसका उल्लेख 'भविष्य पुराण' और 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में आता है । मैं तुम्हें ये दोनों ही कथाएँ उनके पूर्ण, अक्षुण्ण और पारंपरिक स्वरूप में सुनाता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर इनका श्रवण करो।"
२. मुख्य कथा: प्रथम संस्करण (पद्म पुराण पर आधारित)
नारद-ब्रह्मा संवाद और राजा मान्धाता का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण बोले— "हे राजन्! प्राचीन काल में सत्यवती-नंदन महर्षि वेदव्यास ने जो कथा वर्णित की है, वह इस प्रकार है। एक समय मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारद ने ब्रह्मलोक में जाकर सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के पास जाकर पूछा— 'हे पितामह! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी की कथा क्या है? उस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? कृपा कर मुझे सुनाएँ।'
ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर कहा— 'हे नारद! तुम भगवान विष्णु के परम भक्त हो, अतः तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। इस चराचर जगत में भगवान विष्णु के दिन (एकादशी) से श्रेष्ठ और पावन अन्य कोई दिन नहीं है। यह एकादशी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। मैं तुम्हें एक अत्यंत प्राचीन और मंगलकारी वृत्तांत सुनाता हूँ, जिसे केवल सुनने मात्र से ही महान पाप नष्ट हो जाते हैं।'
त्रेता युग में सूर्यवंश (विवस्वान के कुल) में मान्धाता नाम के एक महान चक्रवर्ती और राजर्षि राजा उत्पन्न हुए। वे अत्यंत सत्यप्रतिज्ञ, प्रतापी, वीर और महान धर्मनिष्ठ शासक थे। संपूर्ण पृथ्वी पर उनके यश की पताका फहराती थी। राजा मान्धाता अपनी प्रजा का पालन अपनी औरस संतानों के समान ही धर्मपूर्वक करते थे। उनके राज्य में कभी कोई अकाल नहीं पड़ता था। महामारी, व्याधि, अकाल मृत्यु या मानसिक संताप का तो उनके राज्य में नामोनिशान तक नहीं था। उनकी प्रजा अत्यंत स्वस्थ थी और धन-धान्य से परिपूर्ण होकर सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी। राजा के राजकोष में कोई भी धन अन्याय, छल या कपट से कमाया हुआ नहीं था। सर्वत्र वेद-ध्वनि गूँजती थी, नित्य यज्ञ होते थे और धर्म के चारों चरण पृथ्वी पर स्थापित थे।
राज्य में भयंकर अकाल और प्रजा का कष्ट
परंतु हे नारद! काल और विधाता की गति बड़ी ही विचित्र और दुर्ज्ञेय है। दैव योग से, किसी अज्ञात पाप के प्रभाव के कारण, राजा मान्धाता के उस अत्यंत समृद्ध और धर्मपरायण राज्य में अचानक भयंकर अकाल पड़ गया। मेघों ने जल बरसाना पूर्णतः रोक दिया। लगातार तीन वर्षों तक वर्षा की एक बूँद भी उस राज्य की भूमि पर नहीं गिरी。
अवर्षण के कारण नदियाँ, सरोवर, तालाब और कुएँ पूर्ण रूप से सूख गए। धरती फटने लगी और उसमें दरारें पड़ गईं। वृक्ष सूख गए, हरियाली नष्ट हो गई और अन्न के अभाव में प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गई। पशु-पक्षी जल के बिना तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने लगे। राज्य में यज्ञ, तर्पण, वेदाध्ययन, देव-पूजन और सभी प्रकार के शुभ कर्म लुप्त होने लगे, क्योंकि बिना जल और अन्न के कोई भी अनुष्ठान संभव नहीं था。
अकाल और भूख से व्याकुल होकर प्रजा जन समूह बनाकर एकत्र हुए और अपने कष्टों का निवारण चाहने के लिए राजा मान्धाता के दरबार में जा पहुँचे। प्रजा ने अत्यंत दीन और करबद्ध होकर राजा से गुहार लगाई—
'हे महाराज! जल ही इस संपूर्ण चराचर जगत का जीवन है। शास्त्रों में जल को 'नार' कहा गया है और जल में निवास करने के कारण ही परमब्रह्म परमात्मा भगवान 'नारायण' कहलाते हैं। जल के बिना अन्न नहीं उपजता और अन्न के बिना प्रजा नष्ट हो रही है। हे राजन्! वेद और शास्त्र कहते हैं कि जब राज्य में कोई पाप होता है या राजा से कोई अपराध होता है, तभी प्रजा को ऐसे दैवीय कष्ट भोगने पड़ते हैं। आप हमारे रक्षक हैं, हमारे पिता हैं। आप ऐसा कोई अनुष्ठान या उपाय खोजें जिससे प्रजा के इस महासंकट का निवारण हो, मेघों से जल बरसे और हमें जीवनदान मिले।'
प्रजा की यह करुण पुकार और उनका आर्तनाद सुनकर राजा मान्धाता का हृदय अत्यंत द्रवित हो गया। राजा ने अत्यंत दुखित स्वर में कहा—
'हे प्रजाजनो! आपका कथन अक्षरशः सत्य है। अन्न ही साक्षात ब्रह्म है और अन्न से ही सभी जीवों का जीवन है। मैं अपने मन और बुद्धि से निरंतर विचार कर रहा हूँ, मैंने अपने कर्मों का सूक्ष्म अवलोकन किया है, परंतु मुझे अपना कोई भी ऐसा पाप या धर्म-विरुद्ध आचरण दिखाई नहीं देता जिसके कारण यह भयंकर सूखा पड़ा है। फिर भी, राजा का यह परम धर्म है कि वह अपनी प्रजा के कष्टों का शमन करे। मैं विधाता के इस कोप का शमन करने के लिए और आप सबके प्राणों की रक्षा के लिए अवश्य ही कोई उपाय करूँगा।'
ऋषियों से परामर्श एवं वन-गमन
अपनी प्रजा को आश्वस्त करने के पश्चात, राजा मान्धाता ने भगवान श्रीहरि को हृदय में प्रणाम किया। उन्होंने अपने राज्य का भार मंत्रियों को सौंपा और स्वयं सेना के कुछ अंगों तथा प्रमुख मंत्रियों को साथ लेकर घने वनों की ओर प्रस्थान किया। वे वनों में विचरते हुए, अनेक महान ऋषियों, तपस्वियों, सिद्धों और ब्रह्मवेत्ताओं के आश्रमों में गए। जहाँ भी वे जाते, वे ऋषियों की वंदना करते और अकाल का कारण व उसका निवारण पूछते रहे。
इस प्रकार वनों में दुर्गम रास्तों पर भ्रमण करते हुए, एक दिन राजा ब्रह्माजी के मानस पुत्र, महान तपस्वी और तेजस्वी महर्षि अंगिरा के आश्रम में जा पहुँचे। महर्षि अंगिरा का आश्रम अत्यंत शांत, पवित्र और उनके तपोबल से देदीप्यमान था। वहाँ सिंह और गौ एक घाट पर जल पीते थे और सर्वत्र परम शांति व्याप्त थी。
राजा मान्धाता ने अपना रथ दूर ही छोड़ दिया और पैदल चलकर महर्षि अंगिरा के समीप पहुँचे। उन्होंने मुनि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। महर्षि अंगिरा ने राजा को उठाया, उन्हें आशीर्वाद दिया और उनसे उनके राज्य, प्रजा, कोष और धर्म के विषय में कुशल-मंगल पूछा।
राजा ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत भाव से कहा— 'हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल था। मैं अपनी प्रजा का पालन पूर्ण धर्म और न्याय के साथ कर रहा था। मेरे राज्य में किसी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ, कोई भी व्यक्ति धर्म-मार्ग से विचलित नहीं था, फिर भी न जाने किस पाप के फलस्वरूप मेरे राज्य में लगातार तीन वर्ष से वर्षा नहीं हुई है। प्रजा अन्न और जल के बिना तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रही है। हे त्रिकालदर्शी मुने! मैं अपनी प्रजा का दुख देखकर अत्यंत संतप्त हूँ और आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मेरे इस संताप को दूर करें और प्रजा की रक्षा का कोई अनुष्ठान, व्रत या उपाय बताने की कृपा करें।'
(पद्म पुराण की पारंपरिक कथा के अनुसार यहाँ महर्षि अंगिरा ने एक विशिष्ट कारण बताया, जो इस प्रकार है:)
महर्षि अंगिरा ने अपने ध्यान योग से संपूर्ण राज्य का अवलोकन किया और अकाल का कारण जानकर कहा— 'हे राजन्! यह त्रेता युग चल रहा है। इस युग में धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा है। इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही कठोर तपस्या करने का अधिकार है। परंतु हे राजन्! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र वन में जाकर कठोर तपस्या कर रहा है। इसी मर्यादा-उल्लंघन और वर्ण-धर्म के विपरीत आचरण के कारण देवताओं ने रुष्ट होकर मेघों को वर्षा करने से रोक दिया है, और तुम्हारे राज्य में यह भयंकर अकाल पड़ा है। हे राजन्! यदि तुम उस तपस्या करने वाले शूद्र का वध कर दो, तो यह अकाल तुरंत समाप्त हो जाएगा और राज्य में पुनः वर्षा होने लगेगी।'
यह सुनकर धर्मपरायण राजा मान्धाता चौंक पड़े। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से परंतु दृढ़ स्वर में कहा— 'हे मुनिश्रेष्ठ! जो व्यक्ति शांतिपूर्वक तपस्या में लीन है, जो भगवान का स्मरण कर रहा है, उसका वध मैं अपने हाथों से कैसे कर सकता हूँ? एक निरपराध और तपस्यारत व्यक्ति की हत्या करना मेरे क्षत्रिय धर्म के सर्वथा विरुद्ध है। मैं अपने राज्य की सुख-शांति के लिए किसी निर्दोष के प्राण नहीं ले सकता। हे कृपानिधान! आप अत्यंत दयालु हैं। कृपया मुझे इस संकट से उबारने के लिए कोई अन्य धर्मसम्मत और शांतिपूर्ण उपाय, कोई उत्तम व्रत या अनुष्ठान बताने की कृपा करें, जिससे उस तपस्वी शूद्र का वध भी न करना पड़े और मेरी प्रजा भी इस अकाल से मुक्त होकर जीवन प्राप्त कर सके।'
पार्श्व (पद्मा) एकादशी व्रत का उपदेश
राजा मान्धाता की धर्मनिष्ठा, प्रजा-वात्सल्य और दयालुता देखकर महर्षि अंगिरा अत्यंत प्रसन्न हुए। मुनि ने मुस्कुराते हुए कहा—
'हे राजन्! यदि तुम किसी का वध नहीं करना चाहते और अहिंसा के मार्ग से ही इस संकट का निवारण चाहते हो, तो एक अत्यंत परम पावन और सिद्ध व्रत का श्रवण करो। तुम भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस एकादशी का नाम 'पार्श्व एकादशी' है, और इसे 'पद्मा एकादशी' या 'परिवर्तिनी एकादशी' भी कहा जाता है。
हे राजन्! यह एकादशी समस्त सिद्धियों को देने वाली, घोर से घोर पापों का नाश करने वाली और राज्य में सुख-समृद्धि लौटाने वाली है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के वामन स्वरूप का पूजन किया जाता है। तुम अपने राज्य में वापस जाओ और अपने मंत्रियों, सेवकों, ब्राह्मणों और संपूर्ण प्रजा के साथ मिलकर इस पद्मा एकादशी का पूर्ण श्रद्धापूर्वक व्रत करो。
दशमी के दिन एकाहार करो, एकादशी के दिन पूर्ण उपवास करते हुए भगवान विष्णु के वामन रूप की आराधना करो, रात्रि में जागरण करो और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को दान देकर व्रत का पारण करो। इस व्रत के अपूर्व प्रभाव और भगवान श्रीहरि की अहैतुकी कृपा से तुम्हारे राज्य के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे, आकाश से अवश्य ही मूसलाधार वर्षा होगी और अकाल का सर्वनाश हो जाएगा।'
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और भगवान विष्णु की कृपा
महर्षि अंगिरा के इन अमृतमयी और आशावर्धक वचनों को सुनकर राजा मान्धाता को अत्यंत संतोष प्राप्त हुआ। उनका हृदय प्रफुल्लित हो गया। उन्होंने मुनि के चरणों में पुनः प्रणाम किया और तुरंत अपने राज्य की राजधानी लौट आए。
जब भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि निकट आई, तब राजा मान्धाता ने संपूर्ण राज्य में मुनादी करवा दी। राजा ने स्वयं, चारों वर्णों की प्रजा (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र), मंत्रियों, सेनापतियों और सेवकों के साथ मिलकर महर्षि अंगिरा द्वारा बताई गई विधि के अनुसार पद्मा (पार्श्व) एकादशी का अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक व्रत किया।
श्रीकृष्ण कहते हैं—
"हे युधिष्ठिर! उस संपूर्ण राज्य द्वारा सामूहिक रूप से किए गए पद्मा एकादशी व्रत के महान पुण्यों के प्रभाव से त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए। एकादशी के पुण्य का ऐसा अद्भुत प्रताप हुआ कि देखते ही देखते आकाश में काले-काले मेघ घिर आए। बिजलियाँ चमकने लगीं, बादलों की घोर गर्जना होने लगी और मूसलाधार वर्षा आरंभ हो गई。
सूखी और फटी हुई धरती पुनः जलमग्न हो गई। सूख चुके नदियाँ, सरोवर और कुएँ लबालब भर गए। कुछ ही समय में संपूर्ण राज्य अन्न-धन और हरी-भरी फसलों से परिपूर्ण हो गया। प्रजा के सभी कष्ट दूर हो गए, रोग-शोक मिट गए और राजा मान्धाता के राज्य में पुनः सुख, शांति और समृद्धि का वास हो गया।"
ब्रह्माजी ने नारद से कथा का उपसंहार करते हुए कहा—
"हे नारद! इस प्रकार जो भी मनुष्य इस पद्मा एकादशी का व्रत करता है, वह इस लोक में संपूर्ण सुखों को भोगकर अंत में भगवान विष्णु के परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त होता है। इसलिए इस व्रत का पालन प्रत्येक मनुष्य को अवश्य करना चाहिए।"
३. मुख्य कथा: द्वितीय संस्करण (भविष्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण पर आधारित)
भगवान विष्णु के पार्श्व-परिवर्तन एवं वामन अवतार का प्रसंग
पद्म पुराण की इस अद्भुत कथा को सुनकर महाराज युधिष्ठिर का रोम-रोम पुलकित हो गया। उन्होंने पुनः करबद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
"हे त्रिलोकीनाथ! हे कृष्ण! आपने कहा कि इस एकादशी को पार्श्व एकादशी या परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। मैं यह जानने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ कि भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन आप क्षीरसागर में शयन करते हुए करवट (पार्श्व) कैसे बदलते हैं? और आपने वामन रूप धारण करके महान दैत्यराज बलि को किस प्रकार छला था? हे प्रभु! मेरे संशयों का निवारण कीजिए और मुझे वामन अवतार की वह संपूर्ण कथा सुनाइए।"
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले— "हे पांडुनंदन! तुमने बहुत ही सुंदर और रहस्यमयी बात पूछी repeat है। अब मैं तुम्हें भविष्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित वह पापनाशक कथा सुनाता हूँ, जिसे श्रवण करने मात्र से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वामन अवतार का गूढ़ रहस्य समझ में आता है। तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
राजा बलि का राज्य और देवलोक पर अधिकार
प्राचीन काल में त्रेता युग के आरंभ में, मेरे परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि नाम के एक महान दैत्यराज हुए। यद्यपि वह दैत्य कुल में उत्पन्न हुए थे, परंतु वे अत्यंत धर्मनिष्ठ, सत्यवादी, जितेंद्रिय, दानवीर और मेरे अनन्य भक्त थे। वे नित्य मेरा पूजन करते थे, ब्राह्मणों का आदर करते थे, गायों की रक्षा करते थे और उनके राज्य में नित्य बड़े-बड़े यज्ञ और अनुष्ठान होते थे। बलि के इस दान, धर्म और यज्ञों के प्रताप से उनका बल और तेज असीमित हो गया था।
अपनी इसी अतुलनीय शक्ति और तपोबल के अहंकार के वशीभूत होकर राजा बलि ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। उनके पराक्रम और असुर सेना के समक्ष देवराज इंद्र और अन्य देवता टिक न सके। बलि ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और संपूर्ण त्रैलोक्य (तीनों लोकों— पृथ्वी, आकाश और पाताल) के अधिपति बन गए。
सभी देवता अपने राज्य और अधिकार से विहीन होकर दर-दर भटकने लगे। अंततः देवराज इंद्र, ब्रह्माजी और देवताओं की माता अदिति के साथ क्षीरसागर में मेरी शरण में आए। देवताओं ने अत्यंत आर्त भाव से वेद सूक्तों और स्तोत्रों से मेरी स्तुति की और अपने उद्धार की प्रार्थना की।
देवताओं की करुण पुकार सुनकर मैंने उन्हें आश्वस्त किया और कहा— 'हे देवताओं! तुम शोक मत करो। दैत्यराज बलि मेरा परम भक्त है, उसने अपने धर्म और दान से यह शक्ति अर्जित की है। परंतु उसका अहंकार बढ़ गया है और उसने देवताओं का अधिकार छीन लिया है। धर्म की स्थापना, ब्रह्मांड के संतुलन और तुम्हारे उद्धार के लिए मैं माता अदिति के गर्भ से शीघ्र ही अवतार लूँगा।'
वामन अवतार और बलि के यज्ञ में गमन
समय आने पर, भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी (जिसे वामन द्वादशी भी कहा जाता है) के दिन, मैंने महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में 'वामन' (बौने ब्राह्मण) का अवतार लिया। मैंने ब्रह्मचारी का वेष धारण किया। मेरे एक हाथ में कमंडलु था, दूसरे हाथ में छत्र था, कंधे पर जनेऊ (यज्ञोपवीत) सुशोभित था, कमर में मूँज की मेखला बँधी थी और शरीर पर मृगछाला थी। मेरा वह रूप अत्यंत तेजस्वी, अलौकिक और मोहक था।
उस समय दैत्यराज बलि नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर भृगुकच्छ नामक स्थान पर एक अत्यंत विशाल और ऐतिहासिक अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर रहे थे। उस यज्ञ में दानवों के गुरु शुक्राचार्य जैसे महान आचार्य पद पर आसीन थे और अनेक ऋषि-मुनि वहाँ उपस्थित थे। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए, मैं अपने वामन ब्रह्मचारी रूप में उस यज्ञ मंडप की ओर चल पड़ा। जैसे ही मैंने यज्ञशाला में प्रवेश किया, मेरे दिव्य तेज से संपूर्ण यज्ञ मंडप प्रकाशमान हो गया। यज्ञ में उपस्थित सभी असुर, ब्राह्मण और ऋषि उस तेजस्वी रूप को देखकर मंत्रमुग्ध रह गए।
जब बलि ने एक तेजस्वी बौने ब्राह्मण बालक को अपनी यज्ञशाला में आते देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उनका हृदय श्रद्धा से भर गया। उन्होंने स्वयं अपने सिंहासन से उठकर आगे बढ़कर मेरा स्वागत किया। बलि ने मुझे अत्यंत आदरपूर्वक उत्तम आसन पर बैठाया, मेरे चरण पखारे और उस पावन चरणामृत को अत्यंत भक्तिभाव से अपने मस्तक पर धारण किया।
बलि ने अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा— 'हे तेजस्वी ब्रह्मचारी! आपके आगमन से आज मेरा यज्ञ पूर्ण रूप से सफल हो गया। मेरा संपूर्ण कुल पवित्र हो गया। आप देखने में तो अत्यंत छोटे हैं, परंतु आपका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है। हे विप्रदेव! आप जो चाहें मुझसे माँग लें। मैं आपको धन, धान्य, स्वर्ण, मणि-माणिक्य, हाथी, घोड़े, रथ, सुंदर कन्याएँ, गाँव या पूरा द्वीप दे सकता हूँ। आप निःसंकोच होकर आज्ञा करें, बलि के द्वार से कोई याचक कभी खाली हाथ नहीं जाता।'
वामन द्वारा तीन पग भूमि की याचना
श्रीकृष्ण कहते हैं— हे युधिष्ठिर! बलि के इन अहंकारयुक्त परंतु धर्मनिष्ठ वचनों को सुनकर मैंने (वामन ने) धर्म और वैराग्य से युक्त अत्यंत शांत वचन कहे。
मैंने कहा— 'हे दैत्यराज! आपके वचन आपके महान कुल के अनुरूप ही हैं। आप भक्त प्रह्लाद के पौत्र हैं, जिनके कुल में कभी कोई कृपण या मिथ्याभाषी उत्पन्न नहीं हुआ। हे राजन्! मनुष्य को उतने की ही कामना करनी चाहिए, जितने से उसकी जीवन-निर्वाह की आवश्यकता पूरी हो जाए। जो ब्राह्मण तीन पग भूमि से संतुष्ट नहीं होता, वह तीनों लोकों का राज्य पाकर भी असंतुष्ट ही रहेगा। लालच का कोई अंत नहीं है。
इसलिए हे राजन्! मुझे स्वर्ण, गाँव, हाथी-घोड़े या किसी राज्य की कोई अभिलाषा नहीं है। मैं तो केवल एक संन्यासी हूँ और मुझे अग्निहोत्र अनुष्ठान के लिए केवल अपने पैरों के नाप से तीन पग (कदम) भूमि चाहिए। यही तीन पग भूमि मेरे लिए संपूर्ण त्रैलोक्य के समान है।'
बलि यह सुनकर हँसे और बोले— 'हे छोटे ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अभी बालकों जैसी ही है। तुम माँगने तो आए हो त्रिलोकाधिपति बलि से, जो तुम्हें एक पल में कुबेर बना सकता है, परंतु माँग रहे हो केवल तीन पग भूमि! इससे तुम्हारा क्या भला होगा? खैर, तुम्हारी जैसी इच्छा। मैं तुम्हें तुम्हारे छोटे-छोटे पैरों से नापकर तीन पग भूमि देने का संकल्प करता हूँ।'
शुक्राचार्य की चेतावनी और बलि का दृढ़ संकल्प
जैसे ही राजा बलि ने जल का पात्र (कमंडलु) उठाकर संकल्प का जल छोड़ना चाहा, दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान गए। उन्होंने बलि का हाथ पकड़ लिया और उसे एकांत में ले जाकर अत्यंत क्रोध और चिंता के साथ कहा—
'हे मूर्ख बलि! तू नहीं जानता कि यह बौना ब्राह्मण कौन है? यह अदिति का पुत्र साक्षात भगवान विष्णु है! यह मायावी है। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए और तेरा सर्वनाश करके इंद्र को पुनः स्वर्ग का राजा बनाने के लिए ही इसने यह रूप धारण किया है। यह कोई साधारण बालक नहीं है, यह अपने तीन पगों में तेरे तीनों लोक नाप लेगा और तेरे पास कुछ नहीं बचेगा। तू संकल्प का जल मत छोड़ और इसे कुछ भी देने से मना कर दे।'
गुरु शुक्राचार्य की बात सुनकर राजा बलि तनिक भी विचलित नहीं हुए, बल्कि उनका मुखमंडल एक अलौकिक चमक से खिल उठा। बलि ने अत्यंत दृढ़ता से कहा—
'हे गुरुदेव! यदि यह साक्षात परमपिता नारायण हैं, तब तो यह मेरा परम सौभाग्य है कि वे मुझसे भिक्षा माँगने आए हैं। जो भगवान सबको देते हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, आज वे मेरे द्वार पर याचक बनकर खड़े हैं। यह तो मेरे लिए परम विजय है! मैंने अपने मुख से दान देने की प्रतिज्ञा कर ली है। अब चाहे मेरा राज्य चला जाए, मेरे प्राण चले जाएँ, या मुझे पाताल जाना पड़े, मैं अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटूँगा। जो भगवान को दान देता है, उसका कभी पतन नहीं होता।'
यह कहकर बलि ने संकल्प का जल अपने हाथ में लिया और मुझे (वामन को) तीन पग भूमि दान करने का अनुष्ठान पूर्ण कर दिया।
त्रिविक्रम रूप का विस्तार और लोकों का मापन
हे युधिष्ठिर! जैसे ही बलि ने तीन पग भूमि का संकल्प मेरे हाथ में दिया, मैंने अपने उस छोटे से वामन रूप का विस्तार करना आरंभ किया। देखते ही देखते मेरा वह शरीर अत्यंत विशाल 'त्रिविक्रम' रूप में परिणत हो गया और संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हो गया।
मैंने अपने उस विराट स्वरूप में संपूर्ण ब्रह्मांड को नापना आरंभ किया:
- भूलोक (पृथ्वी) पर मैंने अपने पद (चरण) रखे।
- भुवर्लोक (अंतरिक्ष) को मैंने अपनी पिंडलियों और जंघाओं से नाप लिया।
- स्वर्ग लोक को मैंने अपनी कटि (कमर) में समाहित कर लिया।
- महर्लोक को मैंने अपने उदर (पेट) में स्थापित किया।
- जनलोक को मैंने अपने हृदय में स्थापित किया।
- तपलोक (तथा यमलोक) को मैंने अपने कंठ में स्थापित किया।
- और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) में मेरा मुख और उसके ऊपर मस्तक स्थापित हो गया।
उस समय सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, समस्त ग्रह, इंद्रादि देवता, नाग, यक्ष और गंधर्व मेरे उस विराट स्वरूप का दर्शन कर अत्यंत विस्मित हुए और वेद सूक्तों से मेरी स्तुति करने लगे। मैंने अपने पहले ही कदम में संपूर्ण पृथ्वी लोक को नाप लिया। दूसरे कदम में मैंने स्वर्ग लोक, अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के ऊर्ध्व लोकों को नाप लिया।
अब तीसरे कदम के लिए ब्रह्मांड में कोई स्थान शेष नहीं बचा था। मैंने बलि से पूछा—
'हे दैत्यराज बलि! तूने मुझे तीन पग भूमि का संकल्प दिया था। मेरे दो पगों में ही संपूर्ण त्रैलोक्य, स्वर्ग, पृथ्वी और दिशाएँ नप चुकी हैं। अब तू ही बता कि मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ? यदि तू अपना संकल्प पूरा नहीं करेगा, तो प्रतिज्ञा भंग करने के अपराध में तुझे नरक में जाना पड़ेगा।'
तीसरा पग और पाताल का वरदान
भगवान का यह रौद्र रूप और कड़े वचन सुनकर भी बलि तनिक भी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और निर्भयता से हाथ जोड़कर कहा—
'हे प्रभु! मेरा संकल्प झूठा नहीं हो सकता। संपत्ति से बड़ा संपत्ति का स्वामी होता है। आपने मेरा राज्य नापा है, अभी मेरा यह शरीर बाकी है। हे वामनदेव! आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए। इससे मेरी प्रतिज्ञा भी पूर्ण हो जाएगी और मैं आपके श्रीचरणों का स्पर्श पाकर धन्य हो जाऊँगा।'
बलि की यह अनन्य भक्ति, सत्यनिष्ठा और संपूर्ण शरणागति देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ। मैंने अपना तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर रख दिया और उसे रसातल (पाताल लोक के सुतल लोक) की ओर भेज दिया।
पाताल में जाते समय बलि ने अत्यंत प्रेम से मेरी स्तुति की। उसकी भक्ति से वशीभूत होकर मैंने कहा— 'हे बलि! मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा और दानवीरता से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने अपना सर्वस्व मुझे अर्पण कर दिया है। जाओ, तुम सुतल लोक का राज्य भोगो, जहाँ का ऐश्वर्य स्वर्ग से भी बढ़कर होगा। और मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ कि मैं सदैव तुम्हारे महल के द्वार पर उपस्थित रहूँगा। मैं अस्त्र-शस्त्र धारण कर स्वयं तुम्हारे राज्य की रक्षा करूँगा और तुम्हारा द्वारपाल बनूँगा।'
पार्श्व (पद्मा) एकादशी और भगवान के करवट लेने का रहस्य
श्रीकृष्ण अपनी कथा को विराम देते हुए कहते हैं— "हे धर्मराज युधिष्ठिर! विरोचन-पुत्र बलि को यह वरदान देने के पश्चात, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की इसी एकादशी के दिन मेरी एक मूर्ति (स्वरूप) बलि के आश्रम (पाताल लोक) में स्थापित हुई। और मेरा दूसरा स्वरूप क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करता है।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) के दिन मैं योगनिद्रा में जाता हूँ, और भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन मैं शयन करते हुए अपनी बायीं करवट से दायीं करवट (पार्श्व) लेता हूँ। कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी) को मैं निद्रा से जाग्रत होता हूँ। इसी कारण भाद्रपद शुक्ल एकादशी को 'पार्श्व एकादशी', 'परिवर्तिनी एकादशी' तथा 'जयंती एकादशी' कहा जाता है。
चूंकि इस दिन तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु करवट बदलते हैं और वामन रूप में बलि पर कृपा करते हैं, इसलिए इस दिन वामन भगवान का और करवट लेते हुए श्रीहरि का विशेष पूजन करना चाहिए।"
४. एकादशी व्रत-विधि एवं पारंपरिक त्याग-नियम
पारंपरिक एकादशी व्रत में दशमी, एकादशी और द्वादशी के दिन विशिष्ट नियमों और वर्जनाओं (त्याग) का विधान है, जिसका पालन करने से ही व्रत पूर्ण माना जाता है। इस पारंपरिक विधान को संक्षेप में निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया गया है :
| तिथि | त्याग करने योग्य वस्तुएँ / कर्म (नियम) |
|---|---|
| दशमी के दिन (११ त्याग) | १. काँसे के पात्र में भोजन २. उड़द ३. मसूर ४. चना ५. कोदो ६. शाक ७. मधु (शहद) ८. दूसरे का दिया हुआ अन्न ९. दो बार भोजन करना १०. स्त्री-प्रसंग (पारस्परिक संबंध)। |
| एकादशी के दिन (११ त्याग) | १. जुआ खेलना २. दिन में शयन (नींद लेना) ३. पान खाना ४. दातुन करना ५. दूसरों की निंदा ६. चुगली ७. चोरी ८. हिंसा ९. स्त्री-प्रसंग १०. क्रोध ११. असत्य भाषण। |
| द्वादशी के दिन (१२ त्याग) | १. काँसे के पात्र का उपयोग २. उड़द ३. मदिरा ४. मधु ५. तेल ६. पतितों से वार्तालाप ७. व्यायाम ८. परदेश गमन (यात्रा) ९. दो बार भोजन १०. स्त्री-प्रसंग ११. बैल की सवारी १२. मसूर। |
इन नियमों का कठोरता से पालन करते हुए, एकादशी की रात्रि में जागरण करना चाहिए और भगवान श्रीहरि के नामों का संकीर्तन करना चाहिए।
५. पारंपरिक उपसंहार और फल-श्रुति
भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का समापन करते हुए इस एकादशी के माहात्म्य और फल-श्रुति का वर्णन इस प्रकार किया—
"हे राजन्! जो मनुष्य भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस पार्श्व (पद्मा) एकादशी का नियम और विधिपूर्वक व्रत करता है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त होकर अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है。
इस दिन जो व्यक्ति भगवान वामन की पूजा करता है, वह वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और शिव— तीनों देवताओं की पूजा कर लेता है, क्योंकि इस दिन इन सभी का तेज वामन रूप में समाहित रहता है ।
व्रत-पारण और दान का पारंपरिक मंत्र:
हे युधिष्ठिर! एकादशी का व्रत पूर्ण करने के पश्चात, द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर कलश स्थापित कर, वामन भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। इस दिन तांबा, चाँदी, चावल, दही, छाता और जूता दान करने का विशेष महत्त्व है। दान करते समय और भगवान की प्रार्थना करते समय इस पारंपरिक मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए:
नमो नमस्ते गोविंद बुध श्रवण संज्ञक।
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव॥
भुक्ति-मुक्ति-प्रदश्चैव लोकानां सुखदायक।
(अर्थात— 'बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुध-श्रवण नाम धारण करने वाले हे भगवान गोविंद! आपको बारंबार नमस्कार है। आप मेरी पाप राशि का नाश करके मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें। आप पुण्यात्मा जनों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले तथा संपूर्ण लोकों को सुख देने वाले हैं।')
महिमा वचन (फल-श्रुति):
हे युधिष्ठिर! जो व्यक्ति एकादशी की रात्रि में जागरण करता है और भगवान के नामों का संकीर्तन करता है, उसके पितृ और पूर्वज वैकुंठ में वास करते हैं。
जो भी मनुष्य अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से इस पापनाशक 'पार्श्व/पद्मा एकादशी' की इस कथा को पढ़ता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है । उसके इस जन्म और पूर्व जन्म के सभी पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं जैसे अग्नि का स्पर्श पाकर रूई का ढेर भस्म हो जाता है। वह मनुष्य मृत्यु के पश्चात स्वर्ग में चंद्रमा के समान प्रकाशित होता है, संसार में उत्तम यश पाता है, और अंत में जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मेरे परम धाम को प्राप्त कर लेता है।"
यह सुनकर महाराज युधिष्ठिर और सभी पांडव अत्यंत आनंदित हुए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में बारंबार साष्टांग प्रणाम किया。
(पार्श्व/पद्मा एकादशी की पारंपरिक व्रत कथा संपूर्ण)