विस्तृत उत्तर
कुक्कुटेश्वर लिंग की स्थापना का प्रामाणिक विवरण स्कंद पुराण के 'काशी खंड' में प्राप्त होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा दिवोदास के शासनकाल में भगवान शिव मन्दराचल पर्वत पर थे, तब उन्होंने काशी की स्थिति जानने के लिए अपने विश्वस्त 'शिव गणों' को समूहों में भेजा। इन गणों में शंकुकर्ण, महाकाल, कुण्डोदर, पिंगल, मयूर, बाण, गोकर्ण, और तारक के साथ 'कुक्कुट' नामक एक विशिष्ट गण भी काशी पहुँचा। जब कुक्कुट गण ने काशी की सीमा में प्रवेश किया, तो वह आनंदवन की शांति और मणिकर्णिका की दिव्यता से इतना मंत्रमुग्ध हुआ कि उसने वापस न जाने का निश्चय किया। अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए कुक्कुट गण ने भगवान शिव के एक विशिष्ट विग्रह की स्थापना की, जो उसी के नाम पर 'कुक्कुटेश्वर लिंग' के रूप में विख्यात हुआ। कुक्कुट गण वहीं स्थित होकर भगवान शिव की कठोर तपस्या और अंतर्मुखी साधना में लीन हो गया।





