विस्तृत उत्तर
शंकुकर्णेश्वर महादेव को 'गुप्त शिवलिंग' कहने के दो कारण हैं — ऐतिहासिक और दार्शनिक।
ऐतिहासिक कारण — काशी ने सदियों तक विदेशी आक्रमण झेले। 1194 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक, 1505-1515 में सिकंदर लोदी, और 1669 ई. में औरंगजेब के काल में काशी विश्वनाथ मंदिर को नष्ट किया गया। इन आक्रमणों से शिवलिंगों की रक्षा के लिए पुजारियों ने कई शिवलिंगों को ज्ञानवापी कुएं, धनवंतरि कुएं, भूमिगत तहखानों और घरों की दीवारों में छिपा दिया। शंकुकर्णेश्वर भी इसी संरक्षण-शृंखला का भाग रहे हैं।
दार्शनिक कारण — वेदांत और वायु पुराण के अनुसार 'लिंग' शब्द सूक्ष्म शरीर (लिंग देह) को भी कहते हैं। मनुष्य का स्थूल शरीर दिखता है, पर जो शरीर कर्मफल और प्राणों को धारण करता है वह सूक्ष्म शरीर पूर्णतः 'गुप्त' है। गुप्त शिवलिंग इसी सत्य का प्रतीक है — शिव का वास बाहरी पाषाण में ही नहीं, साधक के अंतःकरण में गुप्त रूप से है।





