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स्तोत्र📜 कालभैरव अष्टकम (आदि शंकराचार्य), शैव परंपरा1 मिनट पठन

कालभैरव अष्टकम का पाठ कब करना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

शंकराचार्य रचित। कब: कालाष्टमी (कृष्ण अष्टमी), भैरवाष्टमी (मार्गशीर्ष), शनिवार/मंगलवार, रात्रि। उद्देश्य: भय नाश (काल=मृत्यु भय), शत्रु नाश, समय अधिपति, काशी मोक्ष। बिना दीक्षा सभी पढ़ सकते।

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विस्तृत उत्तर

कालभैरव अष्टकम आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भगवान कालभैरव (शिव का उग्र रूप) की स्तुति है। काशी (वाराणसी) के कालभैरव मंदिर से इसका विशेष संबंध है।

कब पाठ करें

  1. 1कालाष्टमी (प्रत्येक कृष्ण अष्टमी): काल भैरव का विशेष दिन।
  2. 2भैरवाष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी): वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण भैरव पर्व।
  3. 3शनिवार/मंगलवार: भैरव के विशेष दिन।
  4. 4रात्रि में: भैरव = रात्रि के देवता।
  5. 5भय/शत्रु समस्या में।
  6. 6काशी यात्रा: काशी में कालभैरव दर्शन पश्चात।

पाठ का उद्देश्य

  • भय निवारण (काल = मृत्यु, भैरव = मृत्यु भय नाशक)।
  • शत्रु नाश।
  • समय प्रबंधन (काल = समय — भैरव समय के अधिपति)।
  • काशी में मोक्ष प्राप्ति।
  • अनुशासन और संयम।

शंकराचार्य कृत — प्रत्येक श्लोक 'कालभैरवाष्टकं' में

देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं...' — भैरव के चरण कमल देवराज इंद्र द्वारा सेवित।

बिना दीक्षा सभी पाठ कर सकते हैं — यह भक्ति स्तोत्र है।

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शास्त्रीय स्रोत
कालभैरव अष्टकम (आदि शंकराचार्य), शैव परंपरा
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