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देव दीपावली पूजा विधि: कार्तिक पूर्णिमा पर काशी एवं गंगा तट पर शास्त्रसम्मत दीपोत्सव
Puja Vidhi

देव दीपावली पूजा विधि: कार्तिक पूर्णिमा पर काशी

📿 पौराणिक•28 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2026
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देव दीपावली (कार्तिक पूर्णिमा) की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि — काशी एवं गंगा तट पर दीपोत्सव, गंगा स्नान, कार्तिक स्नान विधान एवं दीप दान।

ज्ञान-सार

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देव दीपावली: कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर काशी एवं गंगा तट पर शास्त्रसम्मत दीपोत्सव एवं पूजन विधि का विस्तृत शोध

प्रस्तावना एवं पारमार्थिक पृष्ठभूमि

सनातन धर्म के विस्तृत और ज्ञान-समृद्ध पंचांग में कार्तिक मास को सर्वश्रेष्ठ, सर्वाधिक फलदायी और महापुण्यदायी मास की संज्ञा दी गई है। पद्म पुराण, स्कंद पुराण (विशेषतः इसका काशी खंड), धर्मसिन्धु तथा निर्णयसिन्धु जैसे अत्यंत प्रामाणिक और मान्य ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा का दिन आध्यात्मिक, पारलौकिक एवं तांत्रिक सिद्धियों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है । इस पावन तिथि को संपूर्ण भारतवर्ष में, और विशेष रूप से आध्यात्मिक राजधानी काशी (वाराणसी) में, 'त्रिपुरारी पूर्णिमा' तथा 'देव दीपावली' के नाम से अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है। पौराणिक आख्यानों एवं शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार, इसी विशिष्ट तिथि पर देवाधिदेव भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक महान और अजेय असुर का संहार कर चराचर जगत को उसके भीषण आतंक से मुक्त किया था । इस महाविजय के उल्लास और कृतज्ञता स्वरूप समस्त देवी-देवताओं ने स्वर्ग से पृथ्वी पर, विशेष रूप से काशी के पावन घाटों पर अवतरित होकर माता गंगा के तट पर दीप प्रज्वलित किए थे। देवताओं द्वारा किए गए इसी आलोक पर्व को देव दीपावली का मूल आधार माना जाता है ।

इसके अतिरिक्त, इस पूर्णिमा का वैष्णव संप्रदाय में भी उतना ही गूढ़ महत्व है। इसी पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु ने प्रलयकाल के अथाह जल से वेदों की रक्षा करने हेतु 'मत्स्यावतार' (मछली का अवतार) धारण किया था । अतः यह तिथि शैव एवं वैष्णव, दोनों ही प्रमुख संप्रदायों के लिए समान रूप से वंदनीय है तथा दोनों ही धाराओं का अद्भुत समन्वय इस दिन गंगा के तटों पर देखने को मिलता है। ज्योतिषीय और खगोलीय दृष्टिकोण से भी इस दिन का विशेष महत्व धर्मसिन्धु में वर्णित है। जब कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर सूर्योदय काल में कृत्तिका नक्षत्र हो और चंद्र दर्शन के समय रोहिणी नक्षत्र की साक्षी हो, तो वह पूर्णिमा 'महाकार्तिकी' अथवा 'महापुण्यमयी' पूर्णिमा कहलाती है। इन दोनों नक्षत्रों का यह विशिष्ट योग इस दिन किए गए किसी भी प्रकार के स्नान, दान, जप और तप के फल को अनंत गुना बढ़ा देता है । प्रस्तुत शोध आलेख देव दीपावली के अवसर पर विशेषतः काशी एवं गंगा तटों पर किए जाने वाले शास्त्रसम्मत स्नान, संकल्प, गंगा पूजन, दीपदान की चरणबद्ध प्रक्रिया, अनुष्ठानिक क्रम, मंत्र-विधान तथा व्रत के नियमों का अत्यंत सूक्ष्म, तार्किक एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है。

स्कंद पुराण एवं धर्मशास्त्रों में कार्तिक मास की महिमा

देव दीपावली के अनुष्ठानिक विधान को समझने से पूर्व कार्तिक मास की उस महिमा को समझना आवश्यक है जिसका वर्णन हमारे आदि ग्रंथों में किया गया है। स्कंद पुराण, जो कि अठारह महापुराणों में सबसे विशाल है, का 'काशी खंड' विशेष रूप से वाराणसी के महात्म्य और कार्तिक मास के अनुष्ठानों का विश्वकोश है । इस पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कार्तिक मास भगवान विष्णु (विशेषकर उनके दामोदर स्वरूप) को अत्यंत प्रिय है। जो व्यक्ति इस संपूर्ण मास में अथवा कम से कम अंतिम पाँच दिनों (पंचरात्र) में 'ॐ नमो नारायणाय' का जप करता है, विष्णु सहस्रनाम और गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करता है, वह समस्त प्रकार की व्याधियों, दरिद्रता और जन्म-मरण के चक्र से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।

भगवद्गीता के दसवें अध्याय (श्लोक 10.11) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥"

(अर्थात् अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए मैं उनके अंतःकरण में स्थित होकर ज्ञान रूपी प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञान जनित अंधकार को नष्ट कर देता हूँ) ।

कार्तिक मास में किया जाने वाला बाह्य दीपदान वस्तुतः इसी आंतरिक ज्ञान-दीप को प्रज्वलित करने की एक भौतिक और अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। पद्म पुराण में भी उल्लेख है कि कार्तिक मास धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाला है । पुष्कर पुराण स्पष्ट करता है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में प्रातः और सायं भगवान विष्णु के समक्ष तिल के तेल से दीप जलाकर पूजन करता है, वह अतुल धन-संपत्ति और लक्ष्मी को प्राप्त करता है ।

व्रत-पूर्व की आधारभूत तैयारी एवं सात्विक विधान

देव दीपावली का अनुष्ठान केवल बाह्य आडंबर या कर्मकांड मात्र नहीं है, अपितु यह अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि और ईश्वरीय चेतना के साथ तादात्म्य स्थापित करने का एक परिष्कृत मार्ग है। शास्त्र निर्देश देते हैं कि कार्तिक मास की पूर्णिमा के व्रती को चतुर्दशी की रात्रि से ही सात्विक नियमों का कठोरता से पालन आरंभ कर देना चाहिए。

पूजन और अनुष्ठान से पूर्व भौतिक और आध्यात्मिक सज्जा अनिवार्य है। सबसे पहले गृह, देवालय तथा यदि संभव हो तो समीपस्थ घाटों की स्वच्छता की जानी चाहिए। सनातन मान्यता है कि जहाँ पूर्ण पवित्रता और व्यवस्था होती है, वहीं माता लक्ष्मी एवं नारायण का स्थायी वास होता है । अनुष्ठान के लिए आवश्यक सामग्री का संचय एकादशी अथवा चतुर्दशी को ही कर लेना चाहिए ताकि ऐन वक्त पर चित्त में कोई विक्षेप उत्पन्न न हो। इन सामग्रियों में प्रमुख हैं: शुद्ध मिट्टी के नए दीपक, आटे के दीपक (जिनका तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशिष्ट है), गाय का शुद्ध घी अथवा शुद्ध तिल का तेल, रुई की बत्तियाँ (विशेषतः 365 तारों वाली महाबत्ती तथा तीन वर्तों वाली त्रिवृत्त बत्ती), पवित्रीकरण हेतु कुशा, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), रोली, अष्टगंध, चंदन, विविध प्रकार के पुष्प (विशेषकर भगवान विष्णु के लिए कमल एवं केतकी), तुलसी दल, पंचामृत (दूध, दही, घी, मधु, शर्करा का मिश्रण), नैवेद्य (ऋतुफल, मिष्ठान, मखाने की खीर), तथा दान के निमित्त अन्न, वस्त्र, स्वर्ण अथवा सामर्थ्यानुसार द्रव्य ।

कार्तिक पूर्णिमा का शास्त्रीय स्नान-विधान

कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ से दो घंटे पूर्व का समय) में स्नान करने का विधान शास्त्रों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। पद्म पुराण और नारद पुराण के अनुसार, इस दिन किसी भी पवित्र नदी, विशेषकर गंगा, यमुना, नर्मदा या गोदावरी में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप भस्म हो जाते हैं और व्यक्ति को सहस्रों अश्वमेध यज्ञों को संपन्न करने के समान अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।

स्नान को केवल जल में प्रवेश कर शरीर को स्वच्छ करने की एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं माना गया है, बल्कि यह एक अत्यंत पवित्र, मंत्र-बद्ध और संकल्प-आधारित अनुष्ठान है। अंगिरा ऋषि के वचनों को उद्धृत करते हुए शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है: "विना दर्भ यत स्नान यच्छ दान विनोदकम। असंख्यात चय जप्तम तत सर्वम निष्फलम भवेत॥" अर्थात्, बिना कुशा धारण किए किया गया स्नान, बिना संकल्प के जल छोड़े किया गया दान और बिना संख्या (माला) के किया गया जप पूर्णतः निष्फल और व्यर्थ हो जाता है । इसलिए स्नान के समय हाथ में कुशा का होना अत्यंत आवश्यक है。

यदि व्रती किसी पवित्र नदी के तट पर उपस्थित नहीं है, तो वह घर पर ही स्नान के जल में कुछ बूँदें गंगाजल की मिश्रित कर सकता है। स्नान से पूर्व दोनों हाथ जोड़कर पवित्र नदियों का आवाहन निम्नलिखित वैदिक मंत्र द्वारा किया जाना चाहिए: "ॐ गंगे यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥" इस मंत्र के उच्चारण से सामान्य जल भी समस्त तीर्थों की ऊर्जा से युक्त होकर परम पवित्र हो जाता है。

जल में प्रवेश करने से पूर्व पृथ्वी माता से क्षमा प्रार्थना करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए: "ॐ अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥" इसके पश्चात पूर्व दिशा (सूर्य की ओर) मुख करके जल में प्रवेश करें और तीन बार पूर्ण डुबकी लगाएँ। डुबकी लगाते समय 'ॐ नमो नारायणाय' अथवा 'ॐ नमः शिवाय' का मानसिक जप निरंतर चलते रहना चाहिए ।

काशी के पंचतीर्थ एवं घाटों का पारलौकिक अनुक्रम

काशी खंड के अनुसार, यदि कोई व्रती देव दीपावली के पावन अवसर पर वाराणसी में उपस्थित है, तो उसे केवल एक घाट पर स्नान कर संतुष्ट नहीं होना चाहिए। मोक्ष प्राप्ति और जन्म-मरण के चक्र से पूर्णतः मुक्त होने हेतु उसे एक ही दिन में विशिष्ट शास्त्रीय क्रम से 'पंचतीर्थ स्नान' करना चाहिए । काशी के ये पाँच प्रमुख घाट भगवान विष्णु के विराट स्वरूप के विभिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन घाटों पर स्नान का क्रम और उनका प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत गूढ़ है, जिसे नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है:

अनुष्ठानिक क्रम पवित्र घाट का नाम प्रतीकात्मक अर्थ (विष्णु के अंग) शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक महत्व
प्रथम अस्सी घाट भगवान विष्णु का मस्तक यह अस्सी नदी और गंगा का पवित्र संगम है। पंचतीर्थ यात्रा का आरंभ अनिवार्य रूप से यहीं से होता है। यह वही स्थान है जहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना पूर्ण की थी ।
द्वितीय दशाश्वमेध घाट भगवान विष्णु का वक्षस्थल पौराणिक मान्यता है कि यहाँ ब्रह्मा जी ने दस अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए थे। यह घाट काशी की सुप्रसिद्ध गंगा आरती का मुख्य केंद्र है ।
तृतीय मणिकर्णिका घाट भगवान विष्णु की नाभि यह काशी का महाश्मशान है जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। इसे मोक्ष का सीधा द्वार माना जाता है ।
चतुर्थ पंचगंगा घाट भगवान विष्णु की जंघाएँ यहाँ पाँच नदियों (गंगा, यमुना, सरस्वती, किरणा और धूतपापा) का प्रतीकात्मक संगम माना जाता है। देव दीपावली के 'आकाशदीप' अनुष्ठान का यह आदि उद्गम स्थल है ।
पंचम आदि केशव घाट भगवान विष्णु के चरण यह वरुणा और गंगा का संगम है। पंचतीर्थ स्नान की पूर्णता और समापन इसी घाट पर भगवान विष्णु के चरणों का ध्यान करते हुए होता है ।

इस संपूर्ण पंचतीर्थ यात्रा को देव दीपावली के दिन भोर में पूर्ण करने वाले साधक को 'सारूप्य मुक्ति' (भगवान के समान रूप प्राप्त होना) का अधिकारी माना गया है。

शास्त्रसम्मत संकल्प-विधि

स्नान के पश्चात और देव दीपावली के मुख्य अनुष्ठान (दीपदान तथा गंगा पूजन) से पूर्व मानसिक और वाचिक संकल्प करना अनुष्ठान की सफलता की प्रथम सीढ़ी है। संकल्प के बिना किया गया कोई भी धार्मिक कर्म दिशाहीन होता है और उसका पूर्ण फल यजमान को प्राप्त नहीं होता。

संकल्प लेने के लिए यजमान को पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिए। दाहिने हाथ में शुद्ध जल, कुशा, पुष्प, अक्षत (साबुत चावल), और द्रव्य (एक या दो रुपये का सिक्का अथवा सुपारी) लेना चाहिए । इसके पश्चात अपने इष्ट देवता का ध्यान करते हुए निम्नलिखित प्रकार से संकल्प मंत्र का वाचन करना चाहिए:

"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य... (यहाँ अपने देश, काल, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष और तिथि का उच्चारण करें)... अद्य कार्तिक पौर्णमास्यां तिथौ, शुभ नक्षत्रे, शुभ योगे... (अपना गोत्र बोलें) गोत्रोत्पन्नः... (अपना नाम बोलें) अहं, श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, मम सपरिवारस्य आयुः आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थं, जन्म-जन्मांतर कृत पापक्षय पूर्वकं भगवान श्री हरि-हर तथा माता भागीरथी प्रीत्यर्थं, देव दीपावली महापर्व निमित्ते षोडशोपचार पूजनं तथा दीपदानं अहं करिष्ये।"

इस मंत्र के उच्चारण के पश्चात हाथ में ली हुई संपूर्ण सामग्री और जल को भूमि पर अथवा सामने रखे हुए किसी ताम्र पात्र में छोड़ देना चाहिए। यह संकल्प यजमान की चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जोड़ देता है。

भगवती गंगा, भगवान शिव एवं श्रीहरि का षोडशोपचार पूजन

संकल्प के पश्चात तट पर ही (अथवा घर के देवालय में) माता गंगा, भगवान शिव (त्रिपुरारी रूप में) और भगवान विष्णु (मत्स्यावतार रूप में) का संयुक्त आवाहन एवं पूजन किया जाता है । तंत्र, आगम और धर्मशास्त्रों में देवताओं की आराधना हेतु 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के उपचारों) पूजन का विधान सर्वाधिक पूर्ण और सर्वमान्य माना गया है ।

षोडशोपचार पूजन की संपूर्ण चरणबद्ध प्रक्रिया निम्नलिखित है, जिसे पूर्ण तन्मयता और भाव के साथ संपन्न किया जाना चाहिए:

पूजन का आरंभ स्वयं की शुद्धि से होता है। सर्वप्रथम 'ॐ हृषीकेशाय नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए दोनों हाथों को धो लें और तीन बार जल का आचमन करें । इसके पश्चात मुख्य उपचार आरंभ होते हैं:

  • आवाहन (Avahana): देवताओं का भावपूर्ण आवाहन कर उन्हें स्वर्ण, रजत अथवा कुशा का पवित्र आसन ग्रहण करने की प्रार्थना करें। "स्वस्थाने परमेश्वर यत्र ब्रह्मादयो देवास तत्र गच्छुता..." भाव से देवताओं को आमंत्रित करें ।
  • आसन (Asana): इष्ट देव को बैठने के लिए सुंदर आसन अर्पित करें।
  • पाद्य (Padya): भगवान के कोमल चरणों को धोने हेतु सुगंधित जल (पाद्य) अर्पित करें।
  • अर्घ्य (Arghya): हाथों को धोने और आचमन के लिए अर्घ्य अर्पित करें।
  • आचमनीय (Achamaniya): मुख शुद्धि के लिए जल प्रदान करें।
  • स्नान (Snana): भगवान की प्रतिमाओं अथवा शालिग्राम/शिवलिंग को सर्वप्रथम पंचामृत (दूध, दही, शुद्ध घी, शहद और शर्करा के मिश्रण) से स्नान कराएँ । तदुपरांत शुद्ध गंगाजल से उन्हें स्वच्छ करें।
  • वस्त्र (Vastra): देवताओं को नवीन, स्वच्छ और ऋतु के अनुकूल वस्त्र अर्पित करें।
  • यज्ञोपवीत (Yajnopavita): भगवान शिव और विष्णु को जनेऊ (यज्ञोपवीत) पहनाएँ।
  • गंध (Gandha): अष्टगंध, कुमकुम और चंदन का लेप लगाएँ। कार्तिक मास में भगवान विष्णु को तुलसी काष्ठ से घिसकर बनाया गया चंदन लगाना अत्यंत ही फलदायी माना गया है ।
  • पुष्प (Pushpa): भगवान विष्णु को तुलसी दल और शिव को बिल्वपत्र (बेलपत्र) अर्पित करें । कार्तिक के पावन मास में श्रीहरि को केतकी और कमल का पुष्प अर्पण करने का विशेष महात्म्य धर्मसिन्धु में वर्णित है ।
  • धूप (Dhupa): सुगंधित धूप, लोबान अथवा गुग्गुल जलाकर भगवान को दिखाएँ और वातावरण को सुवासित करें ।
  • दीप (Dipa): शुद्ध गाय के घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर भगवान की आरती उतारें और उनका स्वागत करें ।
  • नैवेद्य (Naivedya): भगवान को ऋतुफल, मिष्ठान, पंचमेवा (काजू, किशमिश, मखाना आदि) और शुद्ध सात्विक भोजन का भोग लगाएँ ।
  • ताम्बूल (Tambula): भोजन के पश्चात मुख शुद्धि हेतु पान का बीड़ा (लौंग, इलायची और सुपारी युक्त) अर्पित करें।
  • नीराजन/आरती (Nirajana/Aarti): कपूर (कर्पूर) और दीपकों से भगवान की पूर्ण आरती करें।
  • प्रदक्षिणा एवं पुष्पांजलि (Pradakshina and Pushpanjali): अपने ही स्थान पर खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें और क्षमा प्रार्थना करते हुए दोनों हाथों से पुष्प अर्पित करें ।

गंगा अष्टकम का शास्त्रीय पाठ

गंगा पूजन के मध्य अथवा आरती के समय आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित 'गंगाष्टकम्' का सस्वर पाठ अत्यंत चमत्कारी और फलदायी माना गया है। यह स्तोत्र मात्र एक कविता नहीं है, बल्कि यह शिव, नारायण और भगवती गंगा के एकात्म स्वरूप का दार्शनिक बोध कराता है, जो देव दीपावली के मूल दर्शन से सीधे जुड़ता है。

इस स्तोत्र की प्रथम पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:

"गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम्। नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥"

(अर्थात्, मैं उन श्री विश्वनाथ का भजन करता हूँ, जिनकी जटाओं का समूह गंगा की लहरों से रमणीय प्रतीत होता है, जिनका वाम भाग निरंतर माता गौरी से सुशोभित है, जो भगवान नारायण को अत्यंत प्रिय हैं, जिन्होंने कामदेव के अहंकार को नष्ट किया है, और जो काशी नगरी के अधिपति हैं।)

इस प्रकार अष्टक के पाठ से संपूर्ण वातावरण शिवमय और गंगामय हो जाता है। अंत में "त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये" कहकर संपूर्ण पूजा भगवान को अर्पित कर देनी चाहिए。

दीपदान का गूढ़ रहस्य एवं चरणबद्ध प्रक्रिया

देव दीपावली के संपूर्ण अनुष्ठान का केंद्रबिंदु और सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग 'दीपदान' है। दीप केवल प्रकाश का साधन नहीं है; यह अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान, चेतना और वैराग्य रूपी प्रकाश का प्रतीक है। कार्तिक मास में दीपदान करने से व्यक्ति नरक की यातनाओं से सदा के लिए मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है ।

दीपकों के प्रकार एवं उनका तांत्रिक शास्त्रीय महत्व

देव दीपावली पर सामान्य दीपकों के अतिरिक्त विशिष्ट प्रकार के दीपकों का प्रयोग किया जाता है, जिनके निर्माण और प्रयोग का अपना एक अलग विज्ञान और फल है:

  • आटे का दीपक (Wheat Dough Lamp): प्रायः लोग मिट्टी या पीतल के दीपक जलाते हैं, किंतु शास्त्र आटे के दीपक को अत्यधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। इसका तार्किक कारण यह है कि अग्नि जिस पात्र में स्थापित होती है, उस पात्र के सूक्ष्म तत्वों को ग्रहण कर वह आस-पास के वातावरण में प्रवाहित करती है। आटे का दीपक पृथ्वी तत्व, सात्विकता, जीवनदायिनी शक्ति और गृहस्थ आश्रम के अन्न-पूर्ण भाव का सीधा प्रतीक है । अतः विशेष कामनाओं की पूर्ति हेतु आटे का दीपक उत्तम माना गया है।
  • त्रिवृत्त दीपक (Three-wick Lamp): स्कंद पुराण के 'काशी खंड' में देव दीपावली के अवसर पर त्रिवृत्त दीपक (तीन बत्तियों वाला दीपक) प्रज्वलित करने का अत्यंत विशेष विधान है। श्लोक है: "त्रिवृत्तया वर्त्या दीपान् दद्यात् सर्वान् सुखप्रदान्" अर्थात् तीन वर्तों (बत्तियों) वाले दीपक का दान मनुष्य को समस्त प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्रदान करता है। यह तीन बत्तियाँ वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों की त्रिगुणात्मक शक्ति का प्रतीक हैं ।
  • 365 बत्तियों का महादीप (365 Wicks Lamp): यदि कोई साधक अथवा गृहस्थ समयाभाव के कारण पूरे कार्तिक मास (प्रतिदिन) दीपदान न कर सका हो, तो कार्तिक पूर्णिमा के दिन 365 बत्तियों का एक महादीप प्रज्वलित करने का अद्भुत विधान है। इसे बनाने के लिए कच्चे सूत (धागे) को अपने हाथ पर 183 बार लपेटा जाता है। जब उस लपेटे हुए सूत को बीच से काटा जाता है, तो उसमें लगभग 365 या 366 तार (बत्तियाँ) प्राप्त होते हैं। इन सभी को एक साथ मिलाकर एक ही बड़े मिट्टी के दीपक अथवा नारियल के कटे हुए गोले में रखा जाता है। इसमें गाय का घी अथवा तिल का तेल पूर्ण रूप से भरकर भगवान के समक्ष या तुलसी के पास प्रज्वलित किया जाता है। यह एक महादीप पूरे वर्ष (365 दिन) के दीपदान के पुण्य की एक ही दिन में पूर्ति कर देता है ।

दीपदान के स्थान एवं दिशा-विधान

दीपक को यत्र-तत्र नहीं रखा जाना चाहिए। शास्त्र इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं:

  • नदी/सरोवर तट (गंगा घाट): देवताओं के निमित्त घाटों पर रखे जाने वाले दीपकों का मुख (लौ) सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए ।
  • देवालय एवं तुलसी के पौधे के पास: भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु यहाँ दीपदान किया जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि सूर्यास्त के पश्चात तुलसी माता का स्पर्श पूर्णतः निषिद्ध है। अतः दीपक को सीधे गमले में या तुलसी के पौधे को स्पर्श करते हुए नहीं रखना चाहिए, बल्कि गमले के निकट भूमि पर थोड़ा चावल या कुशा का आसन देकर दीपक स्थापित करना चाहिए ।
  • पितरों के निमित्त (यम दीप): अपने पितरों और पूर्वजों के निमित्त दीपदान सदैव घर के बाहर अथवा घर की छत पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके खुले आसमान के नीचे किया जाता है ।
  • अन्य शुभ स्थान: पीपल का वृक्ष, शमी का वृक्ष, आँवला का वृक्ष, घर का मुख्य द्वार (देहरी के दोनों ओर), चौराहे और दुर्गम ऊबड़-खाबड़ मार्ग। स्कंद पुराण कहता है कि जो व्यक्ति कीटों और कांटों से भरे दुर्गम मार्गों पर दीपदान करता है, वह नरक की यातनाओं से बच जाता है ।

आकाशदीप की परंपरा एवं पंचगंगा घाट का ऐतिहासिक महत्व

काशी में देव दीपावली के अवसर पर 'आकाशदीप' (Sky Lamp) दान की एक अत्यंत अनूठी और प्राचीन परंपरा है। यद्यपि आज संपूर्ण काशी जगमगाती है, किंतु ऐतिहासिक और अनुष्ठानिक रूप से इस परंपरा का आदि उद्गम काशी के 'पंचगंगा घाट' से माना जाता है । आकाशदीप के अंतर्गत बाँस के ऊँचे खंभों पर एक टोकरी में दीपक रखकर उसे आकाश की ओर रस्सियों के सहारे खींचा जाता है और प्रज्वलित किया जाता है。

धर्मशास्त्रों के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा से लेकर कार्तिक मास की पूर्णिमा तक पितरों का वास पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है। आकाशदीप का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में विचरने वाले पितरों, प्रेतों और देवताओं को मार्ग दिखाना है, ताकि वे इस प्रकाश को देखकर संतुष्ट हों और अपने-अपने लोकों को নির্বिघ्न लौट सकें । शास्त्रों में यह भी उल्लिखित है कि दूर से इस आकाशदीप के दर्शन मात्र से भी असीम पुण्य की प्राप्ति होती है और अनिष्ट शक्तियों का विनाश होता है ।

दीपदान विधान एवं उनका शास्त्रीय अर्थ

दीपक प्रज्वलित करते समय और उसे दान करते समय विशिष्ट मंत्रों का उच्चारण अनिवार्य है। मंत्र-विहीन कर्म को शास्त्रों में 'अपूर्ण' माना गया है ।

  • 1. दीपक प्रज्वलन मंत्र: दीपक को प्रज्वलित करते ही सर्वप्रथम ज्योति को नमन करना चाहिए: "शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसंपदा। शत्रु बुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते॥" (अर्थ: जो ज्योति शुभ करती है, कल्याण करती है, आरोग्य प्रदान करती है, धन-संपत्ति लाती है और मेरे भीतर एवं बाहर के शत्रुओं की दुर्बुद्धि का विनाश करती है, ऐसी परब्रह्म स्वरूप दीप ज्योति को मैं नमन करता हूँ।)
  • 2. दीपदान अर्पण मंत्र (विष्णु एवं अन्य देवताओं हेतु): "भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने। त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥" (अर्थ: मैं परमपिता परमात्मा को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ यह दीप अर्पित करता हूँ। हे दीपज्योति! आप मेरी घोर नरक की यातनाओं से रक्षा करें, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।)
  • 3. पितरों के निमित्त दीपदान (आकाशदीप) मंत्र: "काले नशामयास त्रयोदशा दीप दाना सूर्य जहा प्रियताम। मम मृत्यु नाम पाश दंडाभ्याम॥" (तथा इस भाव के साथ प्रार्थना करें) "हे पितर, आपको नमस्कार है। प्रेतों को नमस्कार है। धर्मस्वरूप भगवान विष्णु, यमराज और दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले रुद्र (शिव) को मेरा नमस्कार है। आप सभी मेरे द्वारा अर्पित इस दीपदान को स्वीकार करें और मुझे सद्गति प्रदान करें।"
  • 4. संक्षिप्त अर्पण विधि: यदि कोई श्रद्धालु विस्तृत संस्कृत मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करने में असमर्थ है, तो उसे हताश होने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्र ऐसे समय में 'नाम मंत्र' का विधान बताते हैं। संबंधित देवता का नाम लेकर "दीपं दर्शयामि" कहना भी उतना ही फलदायी है। उदाहरणार्थ: ॐ विष्णवे नमः दीपं दर्शयामि, ॐ नमः शिवाय दीपं दर्शयामि, ॐ नमो नारायणाय नमः दीपं दर्शयामि ।

काशी के घाटों पर दीप प्रज्वलन का ऐतिहासिक एवं अनुष्ठानिक क्रम

देव दीपावली की संध्या, विशेष रूप से गोधूलि बेला और प्रदोष काल में, काशी के समस्त 84 घाटों पर दीपकों को एक अत्यंत सुव्यवस्थित और शृंखलाबद्ध रूप में सजाया जाता है। इस अलौकिक दृश्य का आरंभ पंचगंगा घाट और अस्सी घाट से होता है ।

सर्वप्रथम घाटों की मुख्य वेदिकाओं और सीढ़ियों पर रंगोली के माध्यम से स्वस्तिक, ॐ, डमरू, त्रिशूल अथवा देवी-देवताओं की भव्य आकृतियाँ उकेरी जाती हैं, और उन्हीं आकृतियों के ऊपर मिट्टी के लाखों दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। गंगा नदी की अविरल धारा में प्रवाहित किए जाने वाले दीपक (फ्लोटिंग दीया) प्रायः प्राकृतिक पत्तों के दोने अथवा आटे के बने होते हैं। इसके पीछे यह गहरा विज्ञान और सात्विक भावना निहित है कि यह सामग्री जल को दूषित नहीं करती, अपितु मछलियों और अन्य जलचरों के लिए आहार का कार्य करती है । संपूर्ण काशी इस रात्रि में ऐसी प्रतीत होती है मानो आकाश के समस्त तारे पृथ्वी पर उतर आए हों, और स्वयं देवता मानव रूप धारण कर इस प्रकाशोत्सव में सम्मिलित हो रहे हों ।

स्तोत्र, पाठ एवं जप का शास्त्रीय विधान

दीपदान के समय और कार्तिक पूर्णिमा की पूरी रात्रि (जिसे जागरण काल भी कहा जाता है) में विशिष्ट स्तोत्रों का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर की सोई हुई कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है और उसे अनंत फल की प्राप्ति होती है:

  • विष्णु सहस्रनाम एवं गजेन्द्र मोक्ष: स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, कार्तिक मास में इनका सस्वर पाठ करने से व्यक्ति शारीरिक रोगों, विपत्तियों और मानसिक असंतोष से तत्काल मुक्त हो जाता है। गजेन्द्र मोक्ष का पाठ व्यक्ति को संकटों से उबारने में अमोघ अस्त्र के समान है ।
  • दामोदराष्टकम्: कार्तिक मास में भगवान विष्णु के दामोदर (कृष्ण) रूप की स्तुति विशेष रूप से की जाती है। "नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं..." से आरंभ होने वाला यह अष्टक भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है और इसका पाठ करने से भगवान के चरणों में अहैतुकी भक्ति प्राप्त होती है ।
  • भगवद्गीता का पाठ: स्कंद पुराण में नारद मुनि से संवाद करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति कार्तिक मास में भगवद्गीता का पाठ करता है, वह जन्म-मरण के अनंत चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है । विशेष रूप से गीता का 7वाँ अध्याय (ज्ञानविज्ञान योग) इस मास में अत्यधिक लाभकारी माना गया है।

महामंत्र एवं बीज मंत्र:

  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय: यह द्वादशाक्षर महामंत्र कार्तिक मास का हृदय है। इसका जप संरक्षण और धर्म की स्थापना करता है ।
  • ॐ नमः शिवाय: त्रिपुरारी शिव की कृपा प्राप्त करने और अज्ञान के नाश हेतु इस पंचाक्षरी मंत्र का जप अनिवार्य है ।
  • ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः: इस दिन माता लक्ष्मी की कृपा और अतुल धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु इस बीज मंत्र का जप किया जाता है ।

नैवेद्य अर्पण एवं अक्षय दान-विधान

शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन किए गए दान को 'अक्षय' (कभी न क्षीण होने वाला) माना गया है। इस दिन किए गए छोटे से छोटे पुण्य का फल हजार गुना होकर प्राप्त होता है ।

नैवेद्य भोग

पूजन के उपरांत भगवान विष्णु को सात्विक मखाने की खीर, ऋतुफल, मिष्ठान और विशेष रूप से 'तुलसी दल' युक्त पंचामृत का भोग लगाया जाता है। भगवान शिव (चूंकि उन्होंने आज ही के दिन त्रिपुरासुर का वध किया था) को उनका प्रिय धतूरा, बिल्वपत्र और कच्चे दूध का भोग अर्पित किया जाता है ।

अक्षय दान का स्वरूप

पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन दान करने का फल दस बड़े यज्ञों के फल के बराबर होता है । प्रमुख दान निम्नलिखित हैं:

  • अन्नदान: ब्राह्मणों, साधुओं और दरिद्रों को आदरपूर्वक बिठाकर भरपेट सात्विक भोजन कराना। इसे महादान कहा गया है ।
  • वस्त्र एवं सुहाग सामग्री दान: ब्राह्मणियों अथवा सुहागिन महिलाओं को नवीन वस्त्र, शृंगार सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ) और फलों का दान करना। मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है और यदि कोई कन्या विवाह योग्य है, तो उसके विवाह के योग शीघ्र बनते हैं ।
  • गोदान: सामर्थ्य के अनुसार प्रत्यक्ष गौ का दान करना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो गौशालाओं में गायों के चारे हेतु द्रव्य (धन) का दान अवश्य करना चाहिए। यह वैतरणी नदी पार कराने में सहायक होता है ।
  • स्वर्ण दान: धातुओं में स्वर्ण साक्षात भगवान विष्णु का भौतिक स्वरूप माना गया है। इस दिन स्वर्ण दान करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
  • दीप दान: समस्त दानों में इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि "सभी उपहारों में से कार्तिक माह में दीपक का उपहार सबसे अच्छा होता है, इसके समान अन्य कोई दान नहीं है" ।

विशेष शास्त्रीय नियम: धर्मशास्त्र स्पष्ट करते हैं कि किसी भी प्रकार के दान के साथ 'दक्षिणा' (द्रव्य/धन) अवश्य दी जानी चाहिए। बिना दक्षिणा के दिया गया दान अपूर्ण और निष्फल माना जाता है ।

धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु के आलोक में व्रत के नियम तथा निषेध

देव दीपावली का व्रत सामान्य व्रतों से भिन्न है। धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु में कार्तिक व्रत के लिए अत्यंत कठोर और सात्विक नियमों का उल्लेख है, जिनका पालन किए बिना अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता :

नियम एवं अनिवार्य आचरण

  • ब्रह्मचर्य का अखंड पालन: व्रती को शारीरिक, मानसिक और वाचिक रूप से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। मन में किसी भी प्रकार के कामुक विचार नहीं आने चाहिए ।
  • भूमि शयन: विलासिता का त्याग करते हुए व्रती को भूमि पर कुशा अथवा सादे कंबल के आसन पर शयन करना चाहिए।
  • एक-भुक्त व्रत: संपूर्ण दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करने का विधान है। कुछ साधक इसे 'एक ग्रास वृद्धि नक्त व्रत' के रूप में भी करते हैं, अथवा पूर्ण निराहार रहते हैं ।
  • क्षमा और दानशीलता: इस दिन यदि कोई याचक या अतिथि घर आए, तो उसे खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए। बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए ।

निषेध क्या कदापि न करें

  • तामसिक आहार का सर्वथा त्याग: प्याज, लहसुन, माँस, मदिरा के साथ-साथ कार्तिक मास में उड़द की दाल, बैंगन, करेला आदि का सेवन पूर्णतः वर्जित है। उड़द की दाल को इस मास में विशेष रूप से निषिद्ध माना गया है ।
  • निंदा एवं क्रोध: वैष्णवों, वेदों, शास्त्रों, गुरुजनों और महिलाओं की निंदा या अपमान करना घोर पाप माना गया है। ऐसा करने से माता लक्ष्मी तत्काल रुष्ट होकर घर से चली जाती हैं ।
  • प्रकृति का अनादर: सूर्यास्त के पश्चात तुलसी के पत्ते तोड़ना सर्वथा वर्जित है। यह कृत्य महापाप की श्रेणी में आता है ।
  • अशुद्धता: घर को मलिन रखना, जाले लगे रहने देना या सूर्योदय के पश्चात देर तक बिस्तर पर पड़े रहना (सोना) वर्जित है ।

मलमास/क्षयमास का विशेष नियम: निर्णयसिन्धु के अत्यंत सूक्ष्म नियमों के अनुसार, यदि किसी वर्ष कार्तिक मास में मलमास (अधिक मास) या क्षय मास पड़ जाए, तो काम्य कर्म, अपूर्व देवताओं का दर्शन, नए व्रत का आरंभ और विशेष उत्सवों का निषेध होता है । यद्यपि, नित्य किए जाने वाले दीपदान और सामान्य पूजा में कोई बाधा नहीं होती。

अनुष्ठान की पात्रता एवं अद्भुत फल-श्रुति

इस महाव्रत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सार्वभौमिक पात्रता है। यह व्रत और अनुष्ठान किसी भी जाति, वर्ण, संप्रदाय या लिंग के भेद से पूर्णतः मुक्त है। कोई भी श्रद्धालु जो श्रद्धापूर्वक, सात्विक नियमों का पालन करते हुए, भगवान विष्णु और शिव में किंचित मात्र भी भेद न करते हुए (हरि-हर अद्वैत भाव से) इस अनुष्ठान को करता है, वह इस असीम पुण्य का अधिकारी है । आधुनिक वैष्णव संप्रदायों के विद्वानों का मत है कि यदि कोई स्त्री मासिक धर्म की अवस्था में है, तो भी वह मानसिक जप कर सकती है और किसी अन्य के माध्यम से दूर से दीपदान करवा सकती है, क्योंकि मृत्यु का समय अनिश्चित है और भगवान का स्मरण किसी भी अवस्था में त्याज्य नहीं है ।

पद्म पुराण, स्कंद पुराण तथा पुष्कर पुराण में कार्तिक पूर्णिमा के स्नान, व्रत और दीपदान की जो फल-श्रुति (परिणाम) बताई गई है, वह अत्यंत अद्भुत है:

  • पाप मुक्ति एवं मोक्ष: इस मास में किए गए स्नान और दीपदान से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के संचित पाप, यहाँ तक कि जन्म-जन्मांतर के कर्म-बंधन भस्म हो जाते हैं ।
  • पितृ दोष से मुक्ति: आकाशदीप एवं दक्षिणमुखी दीपदान करने से पितरों को तत्काल सद्गति प्राप्त होती है। वे नरक की भयानक यातनाओं से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्रस्थान करते हैं ।
  • अतुल धन-संपत्ति एवं ऐश्वर्य: जो व्यक्ति भगवान विष्णु और लक्ष्मी के समक्ष दीप जलाता है, उसे 'अतुल धन लक्ष्मी' की प्राप्ति होती है और वह अपने अगले जन्म में भी ऐश्वर्यवान कुल में उत्पन्न होता है ।
  • शारीरिक आरोग्य: कार्तिक में सूर्योदय से पूर्व स्नान करने और सूर्य को अर्घ्य देने से उत्तम स्वास्थ्य और निरोगी काया प्राप्त होती है ।
  • परम पद की प्राप्ति: "त्रिपुरारी पूर्णिमा" के पावन अवसर पर निष्काम भाव से शिव पूजन और बैल (नंदी) दान करने से साक्षात शिवलोक (कैलाश) की प्राप्ति होती है, तथा विष्णु पूजन से बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है ।

निष्कर्ष

देव दीपावली केवल घाटों को अनगिनत दीयों से सजाने का भौतिक या पर्यटन उत्सव मात्र नहीं है; यह सनातन भारतीय दर्शन के उस गूढ़ और पारमार्थिक रहस्य का प्रकटीकरण है जहाँ जीव अपने अंतर्मन के अज्ञान और अहंकार रूपी अंधकार (त्रिपुरासुर) को शिव के ज्ञान रूपी बाण से नष्ट कर अपनी आत्मा को आलोकित करता है। कार्तिक पूर्णिमा पर किया जाने वाला गंगा स्नान, जहाँ एक ओर जल तत्व के माध्यम से शरीर और बाह्य आवरण की शुद्धि करता है, वहीं दीपदान अग्नि तत्व के माध्यम से साधक के सूक्ष्म शरीर, विचारों और प्राणों का परिष्कार करता है。

काशी के पंचगंगा घाट से ऐतिहासिक रूप से आरंभ होकर आज संपूर्ण विश्व में ख्याति प्राप्त करने वाला यह दीपोत्सव इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि शास्त्रसम्मत विधियों (संकल्प, षोडशोपचार पूजन, मंत्रोच्चार और दान) के साथ किया गया लघुतम प्रयास भी (जैसे 365 बत्तियों का एक साधारण सा दीपक) अनंत और अक्षय फलदायी हो जाता है। अतः प्रत्येक धर्मनिष्ठ श्रद्धालु को कार्तिक पूर्णिमा के दिन उपर्युक्त वर्णित शास्त्रीय मर्यादाओं, नियमों और वैदिक मंत्रों का कड़ाई से पालन करते हुए देव दीपावली का यह पावन अनुष्ठान पूर्ण करना चाहिए। इस विधि-विधान से किए गए अनुष्ठान से न केवल इहलोक (वर्तमान जीवन) में सुख, समृद्धि, धन-धान्य और शांति प्राप्त होती है, अपितु परलोक में भी सद्गति और शाश्वत मोक्ष का मार्ग চিরकाल के लिए प्रशस्त हो जाता है। यही इस महाव्रत का अंतिम और सर्वोच्च सत्य है。

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

पूजा विधि

कमला देवी की पूजा कब और कैसे करते हैं?

कमला पूजा का समय: प्रत्येक शुक्रवार + दीपावली अमावस्या। धनतेरस से दीपावली तक लक्ष्मी-कुबेर पूजन। ब्रह्म मुहूर्त = शुभ समय।

पर्व

देव दीपावली कब मनाते हैं और कैसे

देव दीपावली: कार्तिक पूर्णिमा — देवताओं की दीपावली। शिव का त्रिपुरासुर वध। गंगा स्नान → शिव-विष्णु पूजा → सन्ध्या में लाखों दीये (नदी तट, घाट, मन्दिर)। काशी में 84 घाटों पर दीपदान + भव्य गंगा आरती। सर्वपापनाश, मोक्ष।

त्योहार पूजा

दीपावली पूजा की संपूर्ण विधि क्या है?

दीपावली पूजा: सफाई → चौकी सज्जा → गणेश पूजन → महालक्ष्मी षोडशोपचार → महाकाली (दवात) → सरस्वती (बहीखाता) → कुबेर (तिजोरी) → दीप-मालिका (11/13/21 दीपक) → आरती → श्री सूक्त पाठ। रात भर दीप प्रज्वलित।

पर्व

देव दीपावली पर काशी में दीपदान का क्या विधान है

काशी देव दीपावली: कार्तिक पूर्णिमा। प्रातः गंगा स्नान → शिव पूजा (त्रिपुरारि) → सन्ध्या में 84 घाटों पर लाखों दीये → दशाश्वमेध घाट महा गंगा आरती → गंगा में दीये प्रवाहित → रात्रि जागरण। स्कन्द पुराण: दीपदान = सर्वपापनाश। शिव का त्रिपुरासुर वध उपलक्ष्य।

व्रत एवं त्योहार

दीपावली पर पाँच दिन कौन-कौन से त्योहार हैं?

दीपावली के पाँच दिन हैं: धनतेरस (धन्वंतरि पूजा), नरक चतुर्दशी (नरकासुर वध स्मृति), दीपावली (लक्ष्मी-गणेश पूजन), गोवर्धन पूजा (अन्नकूट), और भाई दूज (यम द्वितीया)।

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