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पर्व📜 स्कन्द पुराण (काशी खण्ड), कार्तिक माहात्म्य, काशी परम्परा2 मिनट पठन

देव दीपावली पर काशी में दीपदान का क्या विधान है

संक्षिप्त उत्तर

काशी देव दीपावली: कार्तिक पूर्णिमा। प्रातः गंगा स्नान → शिव पूजा (त्रिपुरारि) → सन्ध्या में 84 घाटों पर लाखों दीये → दशाश्वमेध घाट महा गंगा आरती → गंगा में दीये प्रवाहित → रात्रि जागरण। स्कन्द पुराण: दीपदान = सर्वपापनाश। शिव का त्रिपुरासुर वध उपलक्ष्य।

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विस्तृत उत्तर

देव दीपावली कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को मनाई जाती है। काशी (वाराणसी) में यह सबसे भव्य पर्व है।

काशी में दीपदान विधान

1स्नान

प्रातः गंगा स्नान — कार्तिक पूर्णिमा का गंगा स्नान अत्यन्त पुण्यदायी। पंचगंगा घाट, दशाश्वमेध घाट प्रमुख।

2दिनभर पूजा

शिव पूजन (त्रिपुरारि — इसी दिन शिव ने त्रिपुरासुर वध किया), विष्णु पूजा, तुलसी पूजा।

3सन्ध्याकाल दीपदान

  • सूर्यास्त के बाद काशी के सभी 84 घाटों पर लाखों मिट्टी के दीये प्रज्वलित।
  • घाटों की सीढ़ियों पर, मन्दिरों में, नावों पर, गंगा में दीये प्रवाहित।
  • प्रत्येक दीये में सरसों/तिल तेल या घी।
  • दीये जलाते समय मंत्र: 'दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीपं नमोऽस्तु ते॥'

4महा गंगा आरती

दशाश्वमेध घाट पर भव्य गंगा आरती — विशाल पंचमुखी दीपकों से, मंत्रोच्चार के साथ। यह दृश्य विश्वप्रसिद्ध है।

5दान

अन्न, वस्त्र, दीपक, तिल, स्वर्ण दान। ब्राह्मण भोजन।

6रात्रि जागरण

सम्पूर्ण रात दीपक जलते रहें। भजन, कीर्तन, शिव स्तुति।

शास्त्रीय विधान

स्कन्द पुराण (काशी खण्ड) में कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान का विस्तृत माहात्म्य है — 'कार्तिक्यां पूर्णिमायां तु दीपदानं करोति यः। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥'

क्यों 'देव दीपावली'

मान्यता है कि शिव द्वारा त्रिपुरासुर वध के उपलक्ष्य में देवताओं ने स्वयं काशी में दीपावली मनाई — इसीलिए 'देवों की दीपावली'।

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शास्त्रीय स्रोत
स्कन्द पुराण (काशी खण्ड), कार्तिक माहात्म्य, काशी परम्परा
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