विस्तृत उत्तर
पुराणों में माँ लक्ष्मी की उपासना के लिए कार्तिक मास और विशेषकर दीपावली (कार्तिक अमावस्या) को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। दीपावली का पर्व केवल दीये जलाने का लौकिक उत्सव नहीं है, बल्कि इसके पीछे पद्म पुराण, भविष्य पुराण और स्कंद पुराण के अत्यंत गहरे आख्यान और कर्मकांडीय विधान जुड़े हुए हैं।
दीपावली के पर्व पर रात्रि में दीप जलाने और लक्ष्मी पूजा के संदर्भ में पद्म पुराण के उत्तरखंड में 'बलि राज्य' का आख्यान मिलता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर दैत्यराज बलि से उसका सर्वस्व (त्रिलोकी) ले लिया, तब बलि की असीम उदारता और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उसे रसातल का राज्य प्रदान किया।
बलि के वरदान माँगने पर भगवान ने कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या (दीपावली की रात्रि) को 'बलिराज्य' घोषित किया। पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति इस बलिराज्य (दीपावली की अर्धरात्रि) के उत्सव में अपने घर को दीपों से प्रज्वलित करता है और महालक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन करता है, उसके घर में वर्ष भर अलक्ष्मी (दरिद्रता) का प्रवेश नहीं होता।





