विस्तृत उत्तर
द्वितीया तिथि का अधिष्ठाता देवता मुख्यतः यमराज हैं, और श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य में द्वितीया तिथि का साक्षात् सम्बन्ध मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी यमराज से स्थापित किया गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है।
द्वितीया तिथि के अधिष्ठाता देवता को दो भागों में समझा जा सकता है। पहला भाग है तिथि का स्वामी यानी यमराज। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं। द्वितीया तिथि उनके आधिपत्य में होती है, और इस तिथि पर किया गया हर शुभ कार्य उनकी प्रसन्नता का कारण बनता है। दूसरा भाग है श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता यानी वसु, रुद्र और आदित्य। ये तीनों श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता हैं, और तीन पीढ़ियों के पितरों के प्रतिनिधि के रूप में हव्य ग्रहण करते हैं।
यमराज का द्वितीया से सम्बन्ध इस प्रकार स्थापित हुआ। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था और उनकी अर्चना की थी। इस सत्कार से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने द्वितीया तिथि को एक महान उत्सव यानी महोत्सर्ग घोषित कर दिया।
इस उत्सव का अद्वितीय प्रभाव यह है कि नरक के जीव भी तृप्ति पाते हैं। इस तिथि के प्रभाव से नरक में यातना भोग रहे जीवों यानी नारकीयाश्च तर्पिताः को भी कुछ समय के लिए तृप्ति और शीतलता प्राप्त होती है। यह यमराज की विशेष कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यमराज की प्रसन्नता का व्यावहारिक प्रभाव यह है कि पितरों को यमदूत नहीं सताते। जब पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध किया जाता है, तो यमराज की विशिष्ट प्रसन्नता के कारण पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती और वे सरलता से ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं।
वसु, रुद्र और आदित्य का श्राद्ध में स्थान विशेष है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। जब कोई वंशज अपने पूर्वजों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह के निमित्त श्राद्ध करता है, तो ये तीनों देवता क्रमशः उन तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में उस हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं और उसे सूक्ष्म रूप में उन मृत पितरों तक पहुँचाते हैं।
प्रत्येक देवता की भूमिका इस प्रकार है। वसु पिता पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिता वसु देव के समान माने जाते हैं। रुद्र पितामह यानी दादा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। पितामह रुद्र देव के समान हैं। आदित्य प्रपितामह यानी परदादा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रपितामह आदित्य देव के समान हैं।
इन तीनों देवताओं की उपस्थिति श्राद्ध में अनिवार्य है। बिना इनके श्राद्ध सम्पन्न नहीं हो सकता। ये देवता श्राद्ध में आहूत हवि को ग्रहण करते हैं और पितरों तक पहुँचाते हैं। यह एक दिव्य सूक्ष्म प्रक्रिया है, जो शास्त्रों में अत्यंत स्पष्ट रूप से वर्णित है।
विश्वेदेवों की भूमिका भी विशेष है। महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। ये भी श्राद्ध के सहायक देवता हैं, जो आवाहन के समय आहूत किए जाते हैं।
भगवान शिव का सम्बन्ध भी द्वितीया श्राद्ध से है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो मनुष्य महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् कैलास धाम को प्राप्त करता है।
इसलिए द्वितीया श्राद्ध में चार स्तरों पर देवताओं की उपस्थिति होती है। पहला स्तर है तिथि के स्वामी यानी यमराज। दूसरा स्तर है श्राद्ध के अधिष्ठाता यानी वसु, रुद्र, आदित्य। तीसरा स्तर है विश्वेदेव यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष। चौथा स्तर है महेश्वर यानी शिव की प्रसन्नता।
इन सब देवताओं की प्रसन्नता का सम्मिलित परिणाम यह होता है कि श्राद्ध सफल हो जाता है। पितरों को तृप्ति मिलती है, यमदूतों की यातना नहीं होती, और वंशज को विशेष फल जैसे कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद, पशु-धन, कैलास प्राप्ति, और विपुल सम्पदा मिलती है। शास्त्रीय आधार के रूप में पद्म पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268, स्कन्द पुराण नागर खण्ड और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया तिथि का मुख्य अधिष्ठाता देवता यमराज हैं, जिनका इस तिथि पर विशेष आधिपत्य रहता है। श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं, जो तीन पीढ़ियों के पितरों के प्रतिनिधि हैं। साथ ही विश्वेदेव और भगवान शिव भी इस तिथि पर विशेष प्रसन्न होते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक




