विस्तृत उत्तर
द्वितीया चन्द्रमा की दूसरी कला है। शास्त्रीय आधार के अनुसार वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में दो पक्ष होते हैं - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है।
चन्द्र कला का अर्थ देखें तो चन्द्रमा का प्रकाशित भाग ही उसकी कला कहलाता है। चन्द्रमा प्रति दिन अपने आकार और प्रकाश में परिवर्तन करता है। इसी परिवर्तन के अनुसार चन्द्रमा की कलाएँ निर्धारित होती हैं। एक पक्ष यानी पन्द्रह दिन में चन्द्रमा अपनी एक पूर्ण अवस्था से दूसरी पूर्ण अवस्था तक पहुँचता है। इस यात्रा में पन्द्रह कलाएँ बनती हैं।
द्वितीया तिथि का चन्द्र कला के साथ सम्बन्ध इस प्रकार है। शुक्ल पक्ष में अमावस्या के बाद चन्द्रमा का प्रकाश बढ़ने लगता है। पहले दिन यानी प्रतिपदा को चन्द्रमा की पहली कला होती है। दूसरे दिन यानी द्वितीया को उसकी दूसरी कला प्रकट होती है। इस दिन चन्द्रमा का प्रकाश थोड़ा बढ़कर एक पतली रेखा से कुछ अधिक स्पष्ट हो जाता है। यह दूसरी कला ही द्वितीया तिथि का प्रतीक है।
कृष्ण पक्ष में स्थिति विपरीत होती है। पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा का प्रकाश घटने लगता है। पहले दिन यानी प्रतिपदा को चन्द्रमा की पन्द्रहवीं कला से एक कला कम होती है। दूसरे दिन यानी द्वितीया को उसकी कला और कम होती है। इस तरह कृष्ण पक्ष की द्वितीया पर चन्द्रमा अपनी क्रमशः घटती हुई दूसरी अवस्था में होता है।
चन्द्र कलाओं का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। शास्त्रों में चन्द्रमा को पितरों का स्वामी माना गया है। पितर चन्द्रलोक से वायु रूप में आते हैं। इसलिए चन्द्रमा की प्रत्येक कला का पितृ-कर्म से सम्बन्ध है। द्वितीया कला विशेष रूप से उन पितरों से सम्बन्धित है, जिनकी मृत्यु इस तिथि को हुई हो।
द्वितीया कला का विशेष शास्त्रीय वर्णन भी है। यह तिथि चन्द्रमा की दूसरी कला होने के कारण द्वितीय यानी दूसरी कहलाती है। संस्कृत में दूसरे को द्वितीय कहते हैं, और इसी से द्वितीया शब्द बना है। हिन्दी लोकभाषा में इसे दूज कहते हैं।
चन्द्र कलाओं की कुल संख्या सोलह मानी गई है। पन्द्रह कलाएँ पन्द्रह तिथियों के लिए, और सोलहवीं कला अमृत कला कहलाती है, जो स्वयं चन्द्रमा की पूर्णता का प्रतीक है। इसलिए द्वितीया कला सोलह कलाओं में दूसरी कला है।
प्रत्येक चन्द्र कला का अधिष्ठाता देवता भी होता है। द्वितीय कला का सम्बन्ध यमराज से माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार धर्मशास्त्रों में द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं, इसलिए द्वितीय कला पर पितृ-कर्म विशेष रूप से प्रसन्नता देता है।
चन्द्र कला और श्राद्ध का सम्बन्ध भी विशेष है। पितर श्राद्ध के समय चन्द्रलोक से वायु रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं। द्वितीया कला पर द्वितीया तिथि का प्रभाव अधिक होता है, इसलिए इस दिन का श्राद्ध पितरों को विशेष तृप्ति देता है।
द्वितीया कला का श्राद्ध-फल भी विशिष्ट है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया तिथि को श्राद्ध करने से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति होती है। यह विशेष फल द्वितीय कला के काम्य फल का परिणाम है।
द्वितीय कला का स्कन्द पुराण से भी सम्बन्ध है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और वह कैलास धाम को प्राप्त करता है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, स्कन्द पुराण और पद्म पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया चन्द्रमा की दूसरी कला है, जो चन्द्रमा के बढ़ते या घटते क्रम में दूसरे स्थान पर आती है। यह कला यमराज से सम्बन्धित है, और पितृ-कर्म के लिए विशेष रूप से शुभ मानी गई है।
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