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द्वितीया तिथि क्या होती है?

द्वितीया तिथि चान्द्र-मास की दूसरी तिथि है, जो चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है।

संक्षिप्त उत्तर

द्वितीया तिथि चान्द्र-मास की दूसरी तिथि है, जो चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। प्रत्येक पक्ष यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया दूसरी तिथि है। इस तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है, और पितृ-कर्मों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है।

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विस्तृत उत्तर

द्वितीया तिथि चान्द्र-मास की दूसरी तिथि है, जो चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में दो पक्ष होते हैं - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है।

द्वितीया तिथि की मूल विशेषताएँ इस प्रकार हैं। पहली विशेषता है इसका क्रम। यह तिथि प्रतिपदा के बाद और तृतीया से पहले आती है। पंचांग में इसका दूसरा स्थान है। दूसरी विशेषता है इसका सम्बन्ध चन्द्रमा से। यह चन्द्रमा की दूसरी कला का प्रतीक है, अर्थात् जब चन्द्रमा अपनी पूर्ण क्षीण अवस्था से धीरे-धीरे बढ़ने या घटने लगता है, उसकी दूसरी अवस्था ही द्वितीया तिथि है।

द्वितीया तिथि दोनों पक्षों में आती है। शुक्ल पक्ष की द्वितीया अमावस्या के बाद आती है, जब चन्द्रमा बढ़ रहा होता है और दूसरी कला तक पहुँचता है। कृष्ण पक्ष की द्वितीया पूर्णिमा के बाद आती है, जब चन्द्रमा घटता हुआ अपनी दूसरी क्षीण कला पर होता है। दोनों ही द्वितीया तिथियाँ शास्त्र-दृष्टि से समान महत्व रखती हैं।

द्वितीया तिथि का धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष है। यह तिथि देवता यमराज से सम्बन्धित मानी गई है। पद्म पुराण के अनुसार धर्मशास्त्रों में द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं, इसलिए द्वितीया तिथि पितृ-कर्मों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी गई है।

द्वितीया तिथि का श्राद्ध-दृष्टि से भी विशेष महत्व है। शास्त्रों का अकाट्य नियम है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु यानी प्राण-त्याग जिस चान्द्र-तिथि को हुई हो, पितृ पक्ष में उसका पार्वण श्राद्ध उसी तिथि को सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसलिए जिनकी मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई है, उनका श्राद्ध इसी तिथि पर होता है।

द्वितीया तिथि का काम्य फल भी अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त, द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है।

द्वितीया तिथि का व्रत-दृष्टि से भी महत्व है। चन्द्र दर्शन का विशेष पुण्य द्वितीया को मिलता है। भगवान श्री गणेश ने चन्द्रमा को वरदान दिया था कि द्वितीया तिथि यानी दूज को जो भी स्त्री या पुरुष चन्द्र दर्शन और पूजन करेंगे, वे पुण्य कमाएंगे। इसलिए द्वितीया तिथि चन्द्र-पूजन के लिए भी पवित्र है।

द्वितीया तिथि का गणितीय निर्धारण चन्द्रमा की गति पर निर्भर करता है। चूँकि चान्द्र तिथियाँ सूर्योदय के साथ प्रारम्भ या समाप्त नहीं होतीं, इसलिए कभी-कभी द्वितीया तिथि दो दिन पड़ सकती है यानी वृद्धि या किसी दिन आंशिक रूप से हो सकती है यानी क्षय। निबन्ध ग्रन्थों में इसके निर्णय के विशेष नियम हैं।

द्वितीया तिथि का यम-द्वितीया से सीधा सम्बन्ध भी पद्म पुराण में वर्णित है। प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। इसी कारण कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यम-द्वितीया या भ्रातृ-द्वितीया कहा जाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में पद्म पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति, स्कन्द पुराण और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया तिथि चान्द्र-मास की दूसरी तिथि है, जो चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। यह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में आती है, और इसका सम्बन्ध यमराज तथा पितृ-कर्मों से विशेष रूप से जुड़ा है।

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