विस्तृत उत्तर
हिंदू धर्म के शास्त्रों (विशेषतः पद्म पुराण) में 84 लाख योनियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
पद्म पुराण का श्लोक
*जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रुद्र संख्यक:।
पक्षिणां दश लक्षणं, त्रिंशल्लक्षाणी पशव:, चतुर्लक्षाणी मानव:।।*
84 लाख योनियों का विभाजन
- ▸जलचर (जलज) — 9 लाख (पानी में रहने वाले जीव)
- ▸स्थावर (पेड़-पौधे) — 20 लाख
- ▸कृमि (कीड़े-मकौड़े) — 11 लाख
- ▸पक्षी — 10 लाख
- ▸पशु (थलचर) — 30 लाख
- ▸मानव — 4 लाख
- ▸कुल = 84 लाख
जन्म चक्र (प्रचलित मान्यता)
एक आत्मा कर्मगति अनुसार:
- 130 लाख बार वृक्ष योनि → 2. 9 लाख बार जलचर → 3. 10 लाख बार कृमि → 4. 11 लाख बार पक्षी → 5. 20 लाख बार पशु → अंत में गौ (गाय) का शरीर → मनुष्य योनि
मनुष्य योनि कैसे मिलती है
- ▸कर्मानुसार 84 लाख योनियाँ पूरी करने और शुभ कर्म करने पर मनुष्य जन्म मिलता है।
- ▸4 लाख बार आत्मा मनुष्य योनि में जन्म लेती है, फिर पितृ/देव योनि प्राप्त होती है।
- ▸मनुष्य योनि में नीच कर्म करने पर पुनः निम्न योनियों में गिरना पड़ता है — इसे 'दुर्गति' कहा गया है।
मनुष्य योनि की विशेषता
- ▸विवेक — केवल मनुष्य में विवेक (सही-गलत का ज्ञान) है।
- ▸कर्म स्वातंत्र्य — केवल मनुष्य ही अपने कर्मों से भाग्य बदल सकता है।
- ▸मोक्ष का द्वार — मनुष्य योनि ही मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है।
- ▸रामचरितमानस: *'बड़े भाग मानुष तन पावा'* — बड़े भाग्य से मनुष्य शरीर मिला है।
वर्गीकरण (जन्म के आधार पर)
प्राणियों को 4 श्रेणियों में बांटा गया: 1. जरायुज (गर्भ से — मनुष्य, पशु), 2. अंडज (अंडे से — पक्षी, सर्प), 3. स्वेदज (पसीने/नमी से — कीट), 4. उद्भिज्ज (पृथ्वी से — पेड़-पौधे)।
ध्यान दें: 84 लाख की संख्या विभिन्न पुराणों में थोड़ी भिन्न-भिन्न बताई गई है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्रिटिश वैज्ञानिक रॉबर्ट एम. मे ने पृथ्वी पर लगभग 87 लाख प्रजातियाँ अनुमानित की हैं — यह संख्या प्राचीन भारतीय गणना (84 लाख) के बहुत निकट है।





