विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न भी कर्म सिद्धांत के गहनतम प्रश्नों में से एक है। शास्त्रों में इसके कई उत्तर हैं:
1पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म
- ▸बुरे कर्म करने वाले का वर्तमान सुख पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों का फल है। जब तक पुराना पुण्य भंडार शेष है, सुख मिलता रहता है।
- ▸जैसे बैंक में पुरानी जमा राशि — बुरे कर्मों से वह घटती जा रही है, पर जब तक है तब तक खर्च हो रही है।
2कर्मफल में विलंब
- ▸बुरे कर्मों का फल तुरंत नहीं आता — *'पापी की पनपता देखि मत ललचाइए जो'*
- ▸समय आने पर अवश्य भोगना पड़ता है — महाभारत में कौरवों का उदाहरण।
3प्रारब्ध का खेल
- ▸वर्तमान जीवन का प्रारब्ध शुभ है (पूर्व पुण्य से), पर वर्तमान के बुरे कर्म (क्रियमाण) भविष्य/अगले जन्म में दुख लाएँगे।
4अंतिम न्याय
- ▸विदुर नीति में कहा गया — *'धर्म की डगर पर चलने में विलंब भले हो, पर सत्य और न्याय की विजय अवश्य होती है।'*
- ▸पुराणों में भी स्पष्ट है — पापी का सुख अस्थायी है, अंत में नरक या निम्न योनियों में जन्म मिलता है।
5माया और भ्रम
- ▸बाहर से जो सुखी दिखते हैं, भीतर से अशांत, भयभीत और असंतुष्ट हो सकते हैं। सच्चा सुख (आनंद) केवल धर्म से प्राप्त होता है।
गीता (2.14): *'मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः, आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत'* — सुख-दुख अस्थायी हैं, इन्हें सहन करो।





