विस्तृत उत्तर
राधा रानी की उत्पत्ति और जन्म कथा विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूपों में मिलती है और इनमें परस्पर भिन्नता है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण में राधा का स्पष्ट नामोल्लेख नहीं मिलता। राधा का प्रमुख वर्णन पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्ग संहिता में मिलता है।
पद्म पुराण के अनुसार राधा गोप राजा वृषभानु की पुत्री थीं। एक कथा में कहा गया है कि वृषभानु जब यज्ञ भूमि साफ कर रहे थे, तब उन्हें भूमि कन्या के रूप में राधा प्राप्त हुईं। एक अन्य कथा में कहा गया है कि उनका जन्म यमुना के निकट रावल ग्राम में माता कीर्ति (कीर्तिदा) के गर्भ से हुआ। उनके जन्म की तिथि भाद्रपद शुक्ल अष्टमी बताई गई है जिसे राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्ग संहिता में गोलोक की कथा मिलती है जिसमें कहा गया है कि राधा श्रीकृष्ण के अर्धांग से प्रकट हुई हैं। एक कथा के अनुसार गोलोक में श्रीदामा के श्राप से राधा को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। पद्म पुराण में यह भी कहा गया है कि विष्णु के कृष्णावतार के साथ लक्ष्मी भी राधा रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं।
गौड़ीय वैष्णव परंपरा में राधा को भगवान की ह्लादिनी शक्ति यानी आनंद-शक्ति का स्वरूप माना गया है। वे कृष्ण की भक्ति और प्रेम की परम अभिव्यक्ति हैं। 'रा' महाविष्णु हैं और 'धा' जगत की धाय — इसीलिए उनका नाम राधा है। चाहे जन्म कथा जो भी हो, ब्रज में और संपूर्ण वैष्णव परंपरा में राधा का महत्व सर्वोपरि है।





