विस्तृत उत्तर
वरुण देव हिंदू धर्म के अत्यंत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण वैदिक देवता हैं। ऋग्वेद में उनका विशेष स्थान है और सातवाँ मंडल उन्हीं को समर्पित है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार वरुण महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र हैं, अर्थात वे भी आदित्यों में शामिल हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में उनकी पत्नी का नाम चर्षणी बताया गया है। वरुण देव जल के अधिपति हैं — समुद्र, नदियाँ, वर्षा और सभी जल निकाय उनके अधीन हैं। वे पश्चिम दिशा के दिक्पाल हैं। उनका वाहन मगरमच्छ है और उनका प्रमुख अस्त्र पाश (फंदा) है। वरुण सत्य और ऋत (विश्व व्यवस्था) के रक्षक हैं और नैतिक नियमों के पालक देवता माने जाते हैं। जो व्यक्ति असत्य बोलता है या नियम तोड़ता है, वरुण उसे अपने पाश में बाँधते हैं। वे ऋग्वेद में सर्वज्ञ देवता के रूप में वर्णित हैं जो सभी का भूत-भविष्य जानते हैं। भागवत पुराण में वर्णित है कि राजा हरिश्चंद्र ने पुत्र प्राप्ति के लिए वरुण की उपासना की थी। इनके भाई मित्र देव माने जाते हैं और दोनों को मिलाकर 'मित्रावरुण' कहते हैं।





