विस्तृत उत्तर
गायत्री मंत्र वेदों का सर्वाधिक पवित्र और शक्तिशाली मंत्र है। इसे 'वेद माता' भी कहा जाता है।
पूरा मंत्र
*ॐ भूर्भुवः स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥*
शब्दशः अर्थ
- ▸ॐ — परम ब्रह्म, सृष्टि का आदि स्वर
- ▸भूः — भूलोक (पृथ्वी), भौतिक जगत
- ▸भुवः — भुवर्लोक (अंतरिक्ष), प्राणिक जगत
- ▸स्वः — स्वर्लोक (स्वर्ग), दिव्य जगत
- ▸तत् — उस (परमात्मा का)
- ▸सवितुः — सविता (सूर्य/सृष्टिकर्ता) का — यहाँ सविता = परमात्मा की प्रेरक शक्ति
- ▸वरेण्यं — सर्वश्रेष्ठ, वरण करने योग्य
- ▸भर्गः — दिव्य तेज, आभा, ज्ञान प्रकाश
- ▸देवस्य — देव (परमात्मा) का
- ▸धीमहि — हम ध्यान करें, धारण करें
- ▸धियः — बुद्धि (हमारी)
- ▸यः — जो (वह परमात्मा)
- ▸नः — हमारी
- ▸प्रचोदयात् — प्रेरित करे, सन्मार्ग पर चलाए
सम्पूर्ण अर्थ: 'उस सर्वश्रेष्ठ सविता (परमात्मा) के दिव्य तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।'
स्रोत: ऋग्वेद (3.62.10), ऋषि — विश्वामित्र, देवता — सविता, छंद — गायत्री (24 अक्षर)।
'ॐ भूर्भुवः स्वः' — यह महाव्याहृति है, मूल गायत्री मंत्र 'तत् सवितुर्वरेण्यं...' से प्रारंभ होता है। महाव्याहृति को बाद में जोड़ा गया (यजुर्वेद परंपरा)।
गायत्री मंत्र की विशेषता: यह एकमात्र मंत्र है जिसमें शरीर, मन और बुद्धि — तीनों की प्रार्थना है। यह किसी विशेष देवता का नहीं, बल्कि सर्वव्यापक परमात्मा (सविता) का मंत्र है।





