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देवी ग्रंथ📜 ऋग्वेद (10.127), दुर्गा सप्तशती (अंग)2 मिनट पठन

देवी रात्रि सूक्त का पाठ कब करना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

रात्रि सूक्त = ऋग्वेद (10.127) + सप्तशती अंग। पाठ समय: सायंकाल/रात्रि, शयन पूर्व, नवरात्रि जागरण, अमावस्या। भय निवारण: रात्रि भय, बुरे स्वप्न में विशेष। फल: भय मुक्ति, नकारात्मकता से रक्षा, शांत निद्रा, अज्ञान नाश।

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विस्तृत उत्तर

रात्रि सूक्त (रात्रि देवी सूक्त) ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध सूक्त है और दुर्गा सप्तशती के अंगपाठ में भी सम्मिलित है।

रात्रि सूक्त का परिचय

  • ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 127 में वर्णित।
  • इसमें रात्रि को देवी के रूप में स्तुति की गई है।
  • रात्रि = अज्ञान का अंधकार, और देवी = उस अंधकार में प्रकाश।

पाठ का समय

1रात्रि में (प्रमुख)

  • सायंकाल या रात्रि पूजा के समय।
  • शयन से पूर्व — रात्रि में सुरक्षा की प्रार्थना।

2सप्तशती पाठ के अंग के रूप में

  • दुर्गा सप्तशती के पाठ में अंगपाठ क्रम में।

3विशेष अवसर

  • नवरात्रि (विशेषकर जागरण की रात)।
  • महाशिवरात्रि (रात्रि जागरण)।
  • अमावस्या रात्रि।
  • काली पूजा (दीपावली रात्रि)।

4भय निवारण हेतु

  • रात्रि में भय लगता हो तो शयन पूर्व इसका पाठ करें।
  • बुरे स्वप्न आते हों तो नियमित पाठ करें।

पाठ का फल

  • रात्रि के भय से मुक्ति।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा।
  • शांतिपूर्ण निद्रा।
  • अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान प्रकाश की प्राप्ति।

प्रमुख श्लोक: 'रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः' — 'तारों से सुशोभित रात्रि देवी चारों ओर से प्रकाशित हो रही हैं।'

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद (10.127), दुर्गा सप्तशती (अंग)
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