विस्तृत उत्तर
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसे सप्तशती की 'कुंजी' (key) कहा गया है।
शास्त्रीय स्थान
- ▸सिद्ध कुंजिका स्तोत्र भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया है।
- ▸इसका स्रोत रुद्रयामल तंत्र माना जाता है।
- ▸यह दुर्गा सप्तशती के षडंग (छह अंगों) में से एक है।
महत्व
1सप्तशती की कुंजी
भगवान शिव ने कहा: 'कुंजिका बिना देवी, सप्तशती पाठ निष्फल।' — अर्थात सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के बिना सप्तशती पाठ का पूर्ण फल नहीं मिलता।
2अंगपाठ का विकल्प
जो व्यक्ति पूर्ण अंगपाठ (कवच, अर्गला, कीलक) नहीं कर सकता, उसके लिए केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने से ही सम्पूर्ण अंगपाठ का फल मिलता है। शिव पार्वती से कहते हैं: 'न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्।' — कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास — इनमें से कुछ भी न किया हो तो भी कुंजिका पढ़ने से सब पूर्ण।
3सरल और शक्तिशाली
यह अपेक्षाकृत छोटा स्तोत्र है (लगभग 30-35 श्लोक) परंतु अत्यंत प्रभावशाली।
4बीज मंत्रों का संग्रह
इसमें 'ऐं', 'ह्रीं', 'क्लीं', 'चामुण्डायै', 'विच्चे' जैसे शक्तिशाली बीज मंत्र संकलित हैं।
पाठ विधि
- ▸दुर्गा सप्तशती पाठ से पूर्व सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ें।
- ▸या स्वतंत्र रूप से भी इसका पाठ किया जा सकता है।
- ▸नवरात्रि, अष्टमी, चतुर्दशी पर विशेष फलदायी।





