विस्तृत उत्तर
देवी माहात्म्य और दुर्गा सप्तशती मूलतः एक ही ग्रंथ हैं, परंतु उनके नाम और संदर्भ में सूक्ष्म भेद है:
देवी माहात्म्य (देवीमाहात्म्यम्)
- ▸यह मार्कण्डेय पुराण का अंश है — अध्याय 81 से 93 (कुछ संस्करणों में 78-90)।
- ▸मूल स्थान (मार्कण्डेय पुराण) में कुल 591 श्लोक हैं।
- ▸इसे 'मूल ग्रंथ' या 'आत्मा' कहा जा सकता है।
- ▸यह सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत ऋषि मार्कण्डेय द्वारा वर्णित है।
दुर्गा सप्तशती
- ▸देवी माहात्म्य के 591 मूल श्लोकों में अर्ध श्लोक और 'उवाच' मंत्रों को गिनकर 700 (सप्तशत) की संख्या पूरी की गई — इसलिए 'सप्तशती' नाम।
- ▸तांत्रिक परंपरा ने इसमें षडंग (छह अंग) जोड़े: कवच, अर्गला, कीलक, रात्रि सूक्त, देवी सूक्त और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र।
- ▸इन अंगों सहित यह 'सशरीर' ग्रंथ बन गया — जिसे 'दुर्गा सप्तशती' कहते हैं।
- ▸इसे 'चण्डी' या 'चण्डी पाठ' भी कहते हैं।
तीन चरित्र (तीनों में समान)
- 1प्रथम चरित्र (अध्याय 1): महाकाली — मधु-कैटभ वध। देवता: ब्रह्मा।
- 2मध्यम चरित्र (अध्याय 2-4): महालक्ष्मी — महिषासुर वध। देवता: विष्णु।
- 3उत्तम चरित्र (अध्याय 5-13): महासरस्वती — शुंभ-निशुंभ वध। देवता: शिव।
सार: देवी माहात्म्य = मूल पौराणिक ग्रंथ (मार्कण्डेय पुराण का भाग)। दुर्गा सप्तशती = वही मूल + तांत्रिक अंग (कवच, अर्गला, कीलक आदि) = पूजा-पाठ हेतु संपूर्ण ग्रंथ। दोनों की मूल कथा और श्लोक एक ही हैं।
नियम: अंगपाठ (कवच, अर्गला, कीलक) बिना सप्तशती पाठ अपूर्ण और दोषपूर्ण माना गया है।





