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देवी ग्रंथ📜 दुर्गा सप्तशती (अर्गला स्तोत्र), मार्कण्डेय पुराण2 मिनट पठन

देवी अर्गला स्तोत्र का पाठ किस उद्देश्य से करें?

संक्षिप्त उत्तर

अर्गला = 'सांकल/ताला खोलने वाला' — देवी कृपा का द्वार खोले। प्रमुख प्रार्थना: 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि' — स्वास्थ्य, विजय, यश दो, शत्रु नाश करो। उद्देश्य: समृद्धि, शत्रु नाश, मनोकामना पूर्ति। पाठ क्रम: कवच → अर्गला → कीलक → मूल सप्तशती।

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विस्तृत उत्तर

अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का दूसरा अंग है (कवच के बाद)। 'अर्गला' का शाब्दिक अर्थ है 'सांकल' या 'ताला खोलने वाली' — अर्थात यह देवी कृपा का द्वार खोलने वाला स्तोत्र है।

पाठ का उद्देश्य

1धन-धान्य और समृद्धि (प्रमुख उद्देश्य)

अर्गला स्तोत्र का मुख्य प्रार्थना वाक्य है: 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।'

अर्थ: हे देवी! मुझे रूप (सुंदरता/स्वास्थ्य) दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

यह प्रार्थना बार-बार दोहराई जाती है — यह स्तोत्र मूलतः भौतिक और आध्यात्मिक दोनों समृद्धि के लिए है।

2शत्रु नाश

द्विषो जहि' = शत्रुओं का विनाश। दृश्य-अदृश्य शत्रुओं, बाधाओं और विघ्नों का निवारण।

3सप्तशती का द्वार खोलना

जैसे ताला खोलने के लिए सांकल (अर्गला) हटानी पड़ती है, वैसे ही सप्तशती के पूर्ण फल प्राप्ति के लिए अर्गला पाठ आवश्यक।

4सभी मनोकामनाओं की पूर्ति

रूप (स्वास्थ्य/सौंदर्य), जय (विजय/सफलता), यश (कीर्ति/सम्मान) — ये तीन प्रमुख कामनाएं इस स्तोत्र से पूर्ण होती हैं।

पाठ क्रम

सप्तशती पाठ में: कवच → अर्गला → कीलक → (मूल पाठ)

ध्यान रखें: अर्गला स्तोत्र का पाठ कवच के बाद और कीलक से पूर्व करना चाहिए।

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शास्त्रीय स्रोत
दुर्गा सप्तशती (अर्गला स्तोत्र), मार्कण्डेय पुराण
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