विस्तृत उत्तर
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का दूसरा अंग है (कवच के बाद)। 'अर्गला' का शाब्दिक अर्थ है 'सांकल' या 'ताला खोलने वाली' — अर्थात यह देवी कृपा का द्वार खोलने वाला स्तोत्र है।
पाठ का उद्देश्य
1धन-धान्य और समृद्धि (प्रमुख उद्देश्य)
अर्गला स्तोत्र का मुख्य प्रार्थना वाक्य है: 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।'
अर्थ: हे देवी! मुझे रूप (सुंदरता/स्वास्थ्य) दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
यह प्रार्थना बार-बार दोहराई जाती है — यह स्तोत्र मूलतः भौतिक और आध्यात्मिक दोनों समृद्धि के लिए है।
2शत्रु नाश
द्विषो जहि' = शत्रुओं का विनाश। दृश्य-अदृश्य शत्रुओं, बाधाओं और विघ्नों का निवारण।
3सप्तशती का द्वार खोलना
जैसे ताला खोलने के लिए सांकल (अर्गला) हटानी पड़ती है, वैसे ही सप्तशती के पूर्ण फल प्राप्ति के लिए अर्गला पाठ आवश्यक।
4सभी मनोकामनाओं की पूर्ति
रूप (स्वास्थ्य/सौंदर्य), जय (विजय/सफलता), यश (कीर्ति/सम्मान) — ये तीन प्रमुख कामनाएं इस स्तोत्र से पूर्ण होती हैं।
पाठ क्रम
सप्तशती पाठ में: कवच → अर्गला → कीलक → (मूल पाठ)
ध्यान रखें: अर्गला स्तोत्र का पाठ कवच के बाद और कीलक से पूर्व करना चाहिए।





