रात्रि सूक्त = ऋग्वेद (10.127) + सप्तशती अंग। पाठ समय: सायंकाल/रात्रि, शयन पूर्व, नवरात्रि जागरण, अमावस्या। भय निवारण: रात्रि भय, बुरे स्वप्न में विशेष। फल: भय मुक्ति, नकारात्मकता से रक्षा, शांत निद्रा, अज्ञान नाश।
- 1ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 127 में वर्णित।
- 2इसमें रात्रि को देवी के रूप में स्तुति की गई है।
- 3रात्रि = अज्ञान का अंधकार, और देवी = उस अंधकार में प्रकाश।
- 4सायंकाल या रात्रि पूजा के समय।
- 5शयन से पूर्व — रात्रि में सुरक्षा की प्रार्थना।
- 6दुर्गा सप्तशती के पाठ में अंगपाठ क्रम में।
- 7नवरात्रि (विशेषकर जागरण की रात)।
- 8महाशिवरात्रि (रात्रि जागरण)।
- 9अमावस्या रात्रि।
- 10काली पूजा (दीपावली रात्रि)।
- 11रात्रि में भय लगता हो तो शयन पूर्व इसका पाठ करें।
- 12बुरे स्वप्न आते हों तो नियमित पाठ करें।
- 13रात्रि के भय से मुक्ति।
- 14नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा।
- 15शांतिपूर्ण निद्रा।
- 16अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान प्रकाश की प्राप्ति।