विस्तृत उत्तर
वेदों में 'सोम' शब्द बहुआयामी है — इसे एकल अर्थ में बाँधना उचित नहीं। ऋग्वेद में सोम का एक पूरा नौवाँ मण्डल समर्पित है जिसमें ११४ सूक्त और १,०९७ मन्त्र हैं। सोम शब्द वैदिक संस्कृत में उल्लास, सौम्यता और चन्द्रमा का अर्थ रखता है।
सोम के तीन प्रमुख अर्थ शास्त्रों में मिलते हैं। पहला — एक वनस्पति अथवा लता जो हिमालय की पर्वत-श्रेणियों में पाई जाती थी। इसे कूटकर, निचोड़कर और छानकर तैयार किया जाता था और यज्ञों में देवताओं को अर्पित किया जाता था। यह मादक नहीं था — ऋग्वेद (१०।८५।३) में स्पष्ट है कि सोम और मद्य (सूरा) अलग-अलग हैं। सोम पुष्टिकारक, आयुवर्धक और रोगनाशक था। दूसरा अर्थ — चन्द्रमा। ऐतरेय ब्राह्मण में चन्द्रमा को सोम का पर्याय बताया गया है। तीसरा — आध्यात्मिक और रूपक अर्थ में महर्षि दयानन्द ने सोम का अर्थ प्रसंगानुसार ईश्वर, राजा, विद्युत्, प्राण और औषधि भी किया है। श्री अरविन्द के अनुसार सोम आनन्द की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। आज भी उस प्राचीन सोमलता की वनस्पतिक पहचान विद्वानों में विचाराधीन है।





