विस्तृत उत्तर
वेदाधिकार के विषय में शास्त्रों में दो स्तर पर चर्चा मिलती है — पाठ का अधिकार (पढ़ने का) और अनुष्ठान का अधिकार (यज्ञादि कर्मकाण्ड का)। यजुर्वेद (२६।२) और ऋग्वेद के अनेक प्रमाणों के आधार पर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सिद्ध किया कि वेदवाणी मनुष्यमात्र के लिए है। वे वाक्य जो स्त्रियों और शूद्रों का निषेध करते हैं, किसी प्रामाणिक वेद-संहिता में नहीं मिलते — वे परवर्ती काल के प्रक्षेप हैं।
पाठ के नियम इस प्रकार हैं। सर्वप्रथम स्नान कर शुद्ध होना चाहिए। गुरु-परम्परा से सीखा हुआ शुद्ध उच्चारण आवश्यक है। वेद में तीन स्वर होते हैं — उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनका ठीक पालन न होने पर मन्त्र की शक्ति प्रकट नहीं होती। दीर्घ को ह्रस्व न बोलें और व्यञ्जन को पूरे रूप में उच्चारित करें। दो पृथक शब्दों को मिलाकर नहीं बोलना चाहिए। ऋकारों (ऋ) को 'र' या 'रि' की तरह बोलना अशुद्ध है। विराम-चिह्नों का पालन करें और मन्त्र के अन्तिम भाग की गति पहले भाग जैसी ही रखें। ऋग्वेद और अथर्ववेद शीघ्र गति, यजुर्वेद मध्यम गति और सामवेद धीमी गति से पढ़ा जाता है। ये नियम इसलिए हैं ताकि हजारों वर्षों से चला आ रहा एक-एक अक्षर शुद्ध बना रहे।





