विस्तृत उत्तर
अग्नि सूक्त ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का प्रथम सूक्त है — और यही विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य का पहला सूक्त और पहला शब्द भी है। इसके ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र (विश्वामित्र के पुत्र) हैं, देवता अग्नि और छन्द गायत्री है। इसमें नौ मन्त्र हैं। ऋग्वेद में अग्नि के स्वतन्त्र २०० सूक्त हैं और सामूहिक रूप से २,४८३ सूक्तों में इनकी स्तुति है।
वैदिक अग्नि केवल भौतिक आग नहीं है — वे पृथ्वीस्थानीय देव हैं जो तीन रूपों में प्रकट होते हैं — पृथ्वी पर यज्ञाग्नि, आकाश में विद्युत् और सूर्यमण्डल में ऊर्जा। ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट कहा गया है — 'अग्निर्वे देवानां प्रथमः' — अग्नि देवताओं में प्रथम हैं। अग्नि देवताओं का मुख माने जाते हैं — यज्ञ में दी गई आहुति इन्हीं के माध्यम से अन्य देवताओं तक पहुँचती है। इसीलिए भगवान् वेदपुरुष ने ऋग्वेद का शुभारम्भ अग्नि की स्तुति से किया।
प्रथम मन्त्र में अग्नि को 'पुरोहित' (यज्ञ में सबसे आगे रहने वाला), 'देव', 'ऋत्विज्' (ऋतु के अनुकूल यज्ञ करने वाला), 'होता' (देवों का आह्वान करने वाला) और 'रत्नधातम' (रत्नों को धारण करने वाला) कहा गया है। एक गहरे अर्थ में अग्नि आत्माशक्ति का भी प्रतीक है — 'यज्ञ का स्थान हृदय में गुप्त है' — यह उपनिषदों ने स्पष्ट किया।





