विस्तृत उत्तर
वेदों को कंठस्थ करने की जो वैज्ञानिक पद्धति ऋषियों ने विकसित की, वह संसार में अद्वितीय है। इसी के बल पर हजारों वर्षों में एक मात्रा का भी परिवर्तन नहीं हुआ। इस पद्धति में मन्त्रों को नाना क्रमों में पढ़-बोलकर मस्तिष्क में इतनी गहराई से अंकित किया जाता है कि यदि कहीं भ्रम हो तो दूसरे क्रम से उसकी तुरन्त जाँच हो सके।
मुख्यतः दो प्रकार के पाठ होते हैं — प्रकृतिपाठ और विकृतिपाठ। प्रकृतिपाठ में संहितापाठ, पदपाठ और क्रमपाठ आते हैं। विकृतिपाठ आठ प्रकार के होते हैं — जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ और घन। इनमें घनपाठ सर्वोच्च और कठिनतम है जिसे पूर्ण रूप से सीखने में लगभग तेरह वर्ष लग जाते हैं। जो पंडित एक वेद का सम्पूर्ण घनपाठ कर ले वह 'घनपाठी' कहलाता है। घनपाठ में शब्दों को आगे-पीछे, मध्य में अनेक प्रकार से उलट-पुलट कर बोला जाता है जिससे अनजाने में कोई परिवर्तन असम्भव हो जाता है।
गुरुकुलों में अध्यापन की परम्परागत विधि में छोटे बच्चों को बचपन से ही अभ्यास कराया जाता था। हाथ और सिर की विशेष गतिविधियों से स्वर की स्थिति याद रखी जाती थी। दक्षिण भारत में आज भी ऐसी पाठशालाएँ हैं जहाँ वेदमन्त्र इन्हीं प्राचीन पद्धतियों से कंठस्थ कराये जाते हैं।





