विस्तृत उत्तर
नासदीय सूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल का १२९वाँ सूक्त है। 'न+असत्' से प्रारम्भ होने के कारण इसे नासदीय सूक्त कहते हैं। इसके रचयिता ऋषि प्रजापति परमेष्ठी हैं और इसमें कुल सात मन्त्र हैं। यह सूक्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उससे पूर्व की परम रहस्यमय अवस्था पर भारतीय चिन्तन का सबसे प्रौढ़ दार्शनिक प्रयास है — मानव जाति के इतिहास में सृष्टि के रहस्य पर यह सबसे पुरानी और उच्चतम दार्शनिक व्याख्या मानी जाती है।
सूक्त का आरम्भ इन शब्दों से होता है — 'नासदासीन्नो सदासात् तदानीम्' — उस समय (सृष्टि से पूर्व) न असत् था, न सत् था। न रात थी, न दिन, न आकाश, न पाताल। सब कुछ अन्धकार में डूबा एकमात्र तत्व था। फिर उस एक में सबसे पहले 'काम' — सृष्टि करने की इच्छाशक्ति — उत्पन्न हुई जो सत् का बीजरूप था। सूक्त का अन्त एक गहन प्रश्न से होता है — इस सृष्टि का स्रष्टा कौन है, इसे वह भी नहीं जानता जो परम व्योम में बैठा इसका अध्यक्ष है, या फिर शायद वह भी नहीं जानता। यह संशय स्वयं में अद्भुत है — ऋषि ईश्वर की सर्वज्ञता पर प्रश्न नहीं उठा रहे, बल्कि यह दिखा रहे हैं कि सृष्टि का मूल इतना गूढ़ है कि उसे मानवीय बुद्धि से जानना असम्भव है।





