विस्तृत उत्तर
पुरुषसूक्त वैदिक सूक्तों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला सूक्त है। यह ऋग्वेद (१०।९०), यजुर्वेद (अध्याय ३१) और अथर्ववेद में उपलब्ध है। इसमें विराट पुरुष — ब्रह्माण्ड की परम सत्ता — का वर्णन है जिसके एक चरण में समस्त प्राणी हैं और तीन चरण अनन्त अंतरिक्ष में स्थित हैं। इसमें वेदों, चारों वर्णों और सृष्टि के विविध अंगों की उत्पत्ति का कथन है।
पुरुषसूक्त का पाठ निम्न अवसरों पर विशेष रूप से किया जाता है। दैनिक पूजा में भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा के समय इस सूक्त के मन्त्रों का विनियोग होता है। विष्णु यज्ञ, महाविष्णु यज्ञ और अतिविष्णु यज्ञ में इन मन्त्रों से आहुति दी जाती है। श्रावण मास में इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है। बड़े धार्मिक अनुष्ठानों, उत्सवों और पर्वों पर देव-पूजन में इसका प्रयोग होता है। सामूहिक पाठ वातावरण को शुद्ध करता है और श्रद्धा का संचार करता है। तिरुमला वेंकटेश्वर मन्दिर में 'पञ्चसूक्तम्' के अंग के रूप में प्रतिदिन इसका पाठ होता है। नियमित स्वाध्याय के रूप में इसे प्रतिदिन सूर्योदय के समय भी पढ़ा जा सकता है।





