विस्तृत उत्तर
घी (Clarified Butter) के सागर से घिरे कुश द्वीप में कुश घास की प्रधानता है जो अग्नि के समान दैवीय आभा बिखेरती है और सभी दिशाओं को प्रकाशित करती है। हिरण्यरेता इसके शासक थे। यहाँ के निवासियों को कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक कहा जाता है जो जम्बूद्वीप के क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के समान हैं। ये लोग यज्ञीय कर्मकांडों में अत्यंत निपुण हैं और भगवान हरि के साक्षात 'अग्नि' स्वरूप (जातवेद) की पूजा करते हैं। उनका यह विश्वास है कि परब्रह्म परमात्मा ही यज्ञों के वास्तविक भोक्ता हैं और वे अपने यज्ञों की आहुति अग्निदेव के माध्यम से उन तक पहुँचाते हैं। इन सभी द्वीपों में रहने वाले लोग पूर्णतः स्वर्गिक जीवन व्यतीत करते हैं।
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