देव-यज्ञ (हवन): घर में सामान्य देव-यज्ञ/हवन करने की शास्त्रसम्मत विधि, प्रक्रिया एवं तार्किक विवेचन
प्रस्तावना एवं यज्ञ की शास्त्रीय तथा दार्शनिक पृष्ठभूमि
भारतीय सनातन परम्परा एवं वैदिक वांग्मय में 'यज्ञ' अथवा 'हवन' को सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय चक्र को संतुलित रखने तथा वैयक्तिक आत्म-शुद्धि का सर्वोच्च साधन माना गया है। वैदिक दर्शन के अनुसार, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् एक वृहद् यज्ञ का ही परिणाम है, और मनुष्य का यह परम कर्तव्य है कि वह इस ब्रह्मांडीय यज्ञ में अपना आहुति-रूप योगदान दे। शतपथ ब्राह्मण, जो कि शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यंत प्रामाणिक एवं विस्तृत व्याख्या ग्रंथ है, यज्ञ की महत्ता को स्पष्ट करते हुए उद्घोष करता है— "यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म" अर्थात् यज्ञ संसार के श्रेष्ठतम कार्यों में से एक है । इसी तथ्य की पुष्टि तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.2.1.4) भी "यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म" कहकर करता है ।
यज्ञ केवल एक बाह्य कर्मकांड या अग्नि में कुछ भौतिक पदार्थों को भस्म कर देने की प्रक्रिया नहीं है, अपितु यह मनुष्यत्व से उठकर देवत्व के संगतिकरण की एक अत्यंत तार्किक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रिया है । शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि ने अत्यंत सूक्ष्मातिसूक्ष्म विषयों पर तात्विक चिंतन प्रस्तुत करते हुए यज्ञ को परम साध्य माना है । जब मनुष्य यज्ञ का संकल्प लेता है, तो उसे यह भावना आत्मसात् करनी पड़ती है कि वह असत्य का परित्याग कर सत्य की भूमिका में प्रतिष्ठित रहे। सत्य की इस भूमिका में प्रतिष्ठित होकर यज्ञानुष्ठान करने से मानव उतने काल तक देवत्व की कोटि को प्राप्त कर लेता है ।
प्राचीन काल में श्रौत यज्ञों (जैसे अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय आदि) का वृहद् विधान था, जिनका वर्णन श्रौतसूत्रों में मिलता है । कालान्तर में, गृहस्थों के दैनिक जीवन को सुचारु एवं आध्यात्मिक रूप से परिपूर्ण बनाने के लिए कल्पसूत्रों के अंतर्गत 'गृह्यसूत्रों' की रचना हुई। ऋग्वेद से सम्बद्ध आश्वलायन गृह्यसूत्र तथा शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध पारस्कर गृह्यसूत्र में गृहस्थों के लिए पंच महायज्ञों (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेवयज्ञ एवं अतिथि-यज्ञ) का विधान किया गया है । इन्हीं पंच महायज्ञों में से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण यज्ञ 'देव-यज्ञ' है, जिसे सामान्य भाषा में अग्निहोत्र या हवन कहा जाता है ।
महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं अन्य वैदिक विद्वानों के अनुसार, अग्निहोत्र के माध्यम से वायु और वर्षा के जल की शुद्धि होती है, जिससे सम्पूर्ण संसार को आरोग्य, बुद्धि, बल और सुख प्राप्त होता है । देवताओं को हवि (भोजन) पहुँचाने का माध्यम अग्नि ही है। देव-यज्ञ का मूल उद्देश्य वैदिक देवताओं का पोषण करना है। मान्यता है कि यदि हम यज्ञ के माध्यम से देवताओं का पोषण नहीं करेंगे, तो ब्रह्मांडीय शक्तियां क्षीण हो जाएंगी और आसुरी (नकारात्मक) शक्तियां प्रबल हो जाएंगी, जिसका सीधा दुष्प्रभाव चराचर जगत् पर पड़ेगा । अतः पर्यावरण के शोधन तथा आत्मिक उत्थान के लिए नित्य देव-यज्ञ (हवन) को गृहस्थों का अनिवार्य धर्म माना गया है।
हवन की पात्रता, नियम एवं निषेध (धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण)
हवन करने के लिए भारतीय धर्मशास्त्रों, विशेषकर मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में अत्यंत स्पष्ट नियम एवं पात्रता का निर्धारण किया गया है। देव-यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला व्यक्ति, चाहे वह ब्रह्मचारी हो अथवा गृहस्थ, उसे शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः पवित्र होना चाहिए ।
पात्रता एवं दैनिक नियम
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, ब्रह्मचारी सदैव व्रती रहता है और उसे अपनी दिनचर्या में वेदाध्ययन के साथ-साथ अग्निहोत्र का भी नियमित पालन करना चाहिए । मनुस्मृति में यह स्पष्ट किया गया है कि अशुद्ध अवस्था में, अपवित्र वस्त्र धारण कर अथवा रजस्वला स्त्री के स्पर्श के पश्चात यज्ञ कर्म निषिद्ध है। हवन करने वाले यजमान को स्नानादि से निवृत्त होकर, शुद्ध एवं स्वच्छ वस्त्र धारण कर ही यज्ञ-वेदी पर आसीन होना चाहिए ।
दिशा के संबंध में भी शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है। हवन कुंड का स्थापन इस प्रकार होना चाहिए कि यजमान का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे । यदि यजमान सपत्नीक (पत्नी के साथ) आहुति दे रहा है, तो पूजा एवं हवन के समय पत्नी का स्थान यजमान (पति) के दाहिने भाग में होना चाहिए । यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संतुलन का परिचायक है।
हस्त मुद्रा विधान
आहुति देते समय हाथों की स्थिति (मुद्रा) का भी यज्ञ के फल पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शास्त्रों में विभिन्न कर्मों के लिए विभिन्न मुद्राओं का विधान है:
- मृगी मुद्रा: अंगूठा, मध्यमा (बीच की उंगली) और अनामिका (तीसरी उंगली) की सहायता से आहुति देना। इसे शांतिकर्मों और सामान्य देव-यज्ञों के लिए सर्वाधिक शुभ एवं उपयुक्त माना गया है ।
- हंसी मुद्रा: सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) को छोड़कर शेष तीन उंगलियों और अंगूठे का प्रयोग करना। यह मुद्रा पौष्टिक कर्मों (समृद्धि एवं स्वास्थ्य वर्धन) के लिए उपयोगी है ।
- सूकरी मुद्रा: इसका प्रयोग मुख्य रूप से अभिचार कर्मों या विशिष्ट तांत्रिक प्रयोगों में किया जाता है, जो सामान्य देव-यज्ञ में वर्जित है ।
शास्त्रीय निषेध एवं प्रायश्चित्त
देव-यज्ञ एक अत्यंत संवेदनशील एवं पवित्र कर्म है, अतः इसमें कई प्रकार के निषेध बताए गए हैं। हवन के दौरान यदि यजमान क्रोध करे, अपशब्द कहे, मिथ्या भाषण करे अथवा हँस पड़े, तो यज्ञ की ऊर्जा खंडित हो जाती है । इसी प्रकार, यदि हवन करते समय अपान वायु (गैस) का उत्सर्जन हो जाए, या किसी अशुद्ध जीव (जैसे बिल्ली, चूहा आदि) का स्पर्श हो जाए, तो इसे यज्ञ में भारी व्यवधान माना गया है। इन त्रुटियों के प्रायश्चित्त स्वरूप शास्त्र निर्देश देते हैं कि यजमान को तुरंत अपने हृदय और जल का स्पर्श कर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए ।
अग्नि को प्रज्वलित करने के संदर्भ में भी कठोर नियम हैं। अग्नि को कभी भी मुख से फूंक मारकर नहीं प्रज्वलित करना चाहिए; इसके लिए पंखे, कुशा अथवा अन्य किसी साधन का प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार, हवन की आहुति सदैव अग्नि के मध्य भाग में (जहाँ अग्नि सर्वाधिक प्रज्वलित हो) दी जानी चाहिए। अग्नि के किनारों पर या केवल धुएं वाले स्थान पर आहुति देना निषिद्ध है। लाक्षणिक रूप से शास्त्रों में कहा गया है कि अग्नि के कान में होम करने से व्यक्ति बहरा होता है, नाक में होम करने से तनावग्रस्त रहता है, और आँख में होम करने से अंधा हो जाता है । इसका गूढ़ अर्थ यही है कि आहुति पूर्ण प्रज्वलित ज्वाला (अग्नि के मुख) में ही अर्पित होनी चाहिए।
यज्ञीय पदार्थ: हवन सामग्री, घृत एवं समिधा का शास्त्रीय विवरण
यज्ञ की सफलता पूर्णतः उसमें प्रयुक्त होने वाले हविर्द्रव्यों (हवन सामग्री) की शुद्धता, गुणवत्ता एवं उनके शास्त्रीय संयोजन पर निर्भर करती है। 'हवि', 'हव्य' या 'हविष्य' उन पवित्र पदार्थों को कहा जाता है जिन्हें मंत्रोच्चार के साथ प्रज्वलित अग्नि में आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है । यजुर्वेद (19.21, 21.40) में होम के लिए उपयोगी कतिपय पदार्थों का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है, जिनमें धाना (भुने हुए जौ), करम्भ (सत्तू), परिवाप (भुने हुए धान), पय (दूध) और दधि (दही) को मुख्य माना गया है ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं परवर्ती यज्ञ-मीमांसकों ने देव-यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले हविष्य को उनके औषधीय एवं वैज्ञानिक गुणों के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया है :
| हविष्य की श्रेणी | शास्त्रीय गुण एवं उद्देश्य | प्रयुक्त होने वाले मुख्य पदार्थ |
|---|---|---|
| सुगन्धित पदार्थ | वातावरण की दुर्गंध नष्ट करना, मन को शांति प्रदान करना एवं देवताओं को प्रसन्न करना। | केशर, अगर, तगर, श्वेत चन्दन, कपूर, इलायची, जायफल, जावित्री, छड़ीला, छालबीला, नागरमोथा, कोकिला । |
| पुष्टिकारक पदार्थ | वायुमंडल में पोषक तत्वों की वृद्धि करना तथा शारीरिक ओज एवं बल बढ़ाना। | गोघृत (गाय का घी), पंचमेवा (काजू, बादाम, अखरोट आदि), जौ (यव), तिल, अक्षत (चावल), शहद, सूखा नारियल (गोला) । |
| मिष्ट (मधुर) पदार्थ | वायु को मधुर एवं स्वास्थ्यप्रद बनाना तथा देवताओं को प्रिय भोग अर्पित करना। | शक्कर, खाण्ड, गुड़, छुआरा, किशमिश, मुनक्का । |
| रोगनाशक वनस्पति | हानिकारक जीवाणुओं, विषाणुओं का नाश कर पर्यावरण एवं शरीर को निरोगी बनाना। | गिलोय, तुलसी, सोमवल्ली, अपामार्ग, भूमि आंवला, भृंगराज, ब्राह्मी, शतावर, अश्वगंधा, मुलेठी, पुनर्नवा, दालचीनी । |
घृत (गाय के घी) का अद्वितीय महत्त्व
ब्राह्मण ग्रंथों, विशेषकर शतपथ ब्राह्मण में, घृत को साक्षात् यज्ञ का स्वरूप माना गया है— "एतध्दै प्रत्यक्षाद्यज्ञरूपं यद् घृतम्" । अग्निहोत्र के लिए सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वाधिक पवित्र सामग्री शुद्ध गोघृत (गाय का घी) ही है। गोघृत अग्नि को प्रदीप्त करने का मुख्य साधन होने के साथ-साथ वातावरण में ऑक्सीजन की वृद्धि करता है। यदि किसी कारणवश गाय का घी उपलब्ध न हो, तो शास्त्र अनुमति देते हैं कि भैंस के घृत, उसके अभाव में बकरी के घृत, और नितांत अभाव में शुद्ध तिल का तेल, अलसी का तेल या पीली सरसों के तेल का उपयोग किया जा सकता है । परन्तु यह स्पष्ट है कि जो आध्यात्मिक और पर्यावरणीय लाभ गोघृत से प्राप्त होता है, वह अन्य किसी द्रव्य से संभव नहीं है।
समिधा (यज्ञीय काष्ठ) का विज्ञान एवं ग्रह-नक्षत्रों से संबंध
समिधा वह पवित्र लकड़ी है जिसे जलाकर अग्नि प्रज्वलित की जाती है और जो हविष्य का आधार बनती है। ऋग्वेद (8.44.1) और यजुर्वेद (3.1) में स्पष्ट उल्लेख है: "समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्", अर्थात् समिधाओं के माध्यम से अग्नि को प्रदीप्त करना चाहिए ।
समिधा चयन के कठोर नियम हैं। समिधा 'प्रादेश मात्र' (अर्थात् हाथ के अंगूठे से लेकर तर्जनी या कनिष्ठा उंगली तक का विस्तार) लंबी होनी चाहिए। मोटाई में यह अंगूठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए। समिधा सड़ी-गली, घुनी हुई, कीड़े-मकोड़ों से युक्त, गंदे स्थानों पर पड़ी हुई या बिना छाल की नहीं होनी चाहिए ।
शास्त्रीय दृष्टि से यज्ञ में निषिद्ध लकड़ियों का भी स्पष्ट उल्लेख है। तेंदू, धव, नीम, कचनार, बहेड़ा, लिसोड़ा, और दूध वाले या सभी प्रकार के कांटेदार वृक्ष (सर्व कंटक वृक्ष विवर्जितम) देव-यज्ञ में समिधा के रूप में सर्वथा वर्जित हैं ।
ज्योतिष शास्त्र एवं यज्ञ-मीमांसा के अनुसार, विभिन्न ग्रहों की शांति तथा विशिष्ट फलों की प्राप्ति के लिए अलग-अलग वृक्षों की समिधाओं का विधान किया गया है। इसका तार्किक आधार इन वनस्पतियों में निहित विशिष्ट रासायनिक एवं औषधीय गुण हैं, जो अग्नि के संपर्क में आकर वायुमंडल में विशेष प्रभाव उत्पन्न करते हैं :
| ग्रह / देवता | समिधा का वृक्ष | शास्त्रीय फल (प्रभाव) |
|---|---|---|
| सूर्य | मदार (आक) | व्याधि एवं समस्त प्रकार के रोगों का नाश |
| चन्द्रमा | पलाश (ढाक) | सर्वकामदा, सभी कार्यों एवं अभीष्ट की सिद्धि |
| मंगल | खैर (खादिर) | अर्थ (धन) एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति |
| बुध | अपामार्ग (चिड़चिड़ा) | अभीष्ट दर्शन, ज्ञान एवं चेष्टा में सफलता |
| बृहस्पति | पीपल (अश्वत्थ) | प्रजा (सन्तति) लाभ एवं गुरु कृपा |
| शुक्र | गूलर (उदुम्बर) | स्वर्ग एवं परम सुख की प्राप्ति |
| शनि | शमी | घोर पापों एवं संकटों का शमन |
| राहु | दूर्वा (दूब) | दीर्घायु एवं स्वास्थ्य रक्षण |
| केतु | कुशा (कुश) | सभी मनोरथों की सिद्धि एवं दैवीय आघातों से रक्षण |
ऋतुओं के अनुसार भी समिधाओं का चयन किया जाता है; जैसे वसंत ऋतु में शमी, ग्रीष्म में पीपल, वर्षा में ढाक (पलाश) या बिल्व, शरद में आम, हेमंत में खैर तथा शिशिर में गूलर या बड़ (बरगद) की समिधा का प्रयोग अत्यंत शुभ माना गया है । सामान्य दैनिक हवन के लिए आम (मैंगीफेरा इण्डिका) की लकड़ी को सर्वाधिक सुलभ एवं प्रामाणिक माना जाता है ।
यज्ञ स्थान शुद्धि, वेदी निर्माण एवं पञ्चभूसंस्कार
हवन आरंभ करने से पूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक शुद्धि अनिवार्य है। यज्ञ-वेदी का निर्माण शुल्बसूत्रों (जैसे कात्यायन शुल्बसूत्र, बौधायन शुल्बसूत्र) के ज्यामितीय नियमों के आधार पर किया जाता है । यद्यपि बड़े अनुष्ठानों में वेदी का आकार अत्यंत विस्तृत होता है, परंतु सामान्य दैनिक देव-यज्ञ के लिए 24x24 अंगुल चौकोर भूमि को नापकर और उसे कुछ अंगुल गहरा खोदकर हवन कुंड निर्मित किया जाता है । आधुनिक समय में तांबे या लोहे के बने बने-बनाए चौकोर अथवा अष्टकोणीय कुण्डों का भी प्रचलन है ।
पञ्चभूसंस्कार (यज्ञकुंड की शुद्धि के पाँच संस्कार)
जिस प्रकार मनुष्य के गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक विभिन्न संस्कार होते हैं, उसी प्रकार अग्नि देव को स्थापित करने से पूर्व उस भूमि (वेदी) को जाग्रत एवं दोषमुक्त करने के लिए पाँच विशिष्ट क्रियाएं की जाती हैं, जिन्हें 'पञ्चभूसंस्कार' कहा जाता है । यह एक अत्यंत गूढ़ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है:
- परिसमूहन: सर्वप्रथम यजमान अपने हाथ में कुशा (पवित्र घास) लेकर दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर कुंड के स्थान को झाड़कर साफ करता है। इसका उद्देश्य भूमि पर स्थित भौतिक अशुद्धियों और धूल-कणों को हटाना है । उन कुशाओं को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में विसर्जित कर दिया जाता है।
- उपलेपन: इसके पश्चात गाय के गोबर (गोमय) और शुद्ध जल (या गंगाजल) से हवन कुंड के भीतर और आस-पास की भूमि का लेपन किया जाता है । गोबर में अद्भुत जीवाणुनाशक गुण होते हैं, जो भूमि को पवित्र और यज्ञ के अनुकूल बनाते हैं।
- उल्लेखन: स्रुवा (हवन में प्रयुक्त होने वाला चम्मच) के मूल भाग से अथवा कुशा से कुंड के भीतर पश्चिम से पूर्व की ओर 'प्रादेश मात्र' (लगभग एक बालिश्त) लंबी तीन रेखाएं खींची जाती हैं। ध्यान रहे, इन रेखाओं को खींचने का क्रम दक्षिण से प्रारंभ होकर उत्तर की ओर होना चाहिए (अर्थात पहली रेखा दक्षिण में, दूसरी मध्य में, और तीसरी उत्तर में)। विपरीत क्रम में रेखा खींचना अमंगलकारी माना गया है ।
- उद्धरण: अंगूठे और अनामिका उंगली (मृगी मुद्रा) को मिलाकर, उन खींची गई तीनों रेखाओं से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी (किंचित मृत्तिका) चुटकी में उठाकर बाएँ हाथ में रखी जाती है। तत्पश्चात उस मिट्टी को दाहिने हाथ से ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में फेंक दिया जाता है । यह क्रिया इस बात का प्रतीक है कि भूमि के भीतर छिपी हुई किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा या आसुरी शक्तियां को यज्ञ क्षेत्र से बाहर निकाल दिया गया है।
- अभ्युक्षण: अंत में, पंचगव्य अथवा गंगाजल से कुशा के द्वारा वेदी पर जल का सिंचन (छिड़काव) किया जाता है। यह अंतिम शुद्धि है, जो भूमि को अग्नि देव के अवतरण के लिए पूर्णतः शीतल, पवित्र एवं सुपात्र बनाती है ।
इन पञ्चभूसंस्कारों के पूर्ण होने के उपरांत ही कुंड अग्नि-स्थापना के योग्य बनता है।
देव-यज्ञ (हवन) की विस्तृत एवं चरणबद्ध शास्त्रीय प्रक्रिया
यज्ञ की प्रक्रिया केवल आहुति देने तक सीमित नहीं है; यह यजमान के शरीर, मन और आत्मा को ब्रह्मांड से जोड़ने की एक यौगिक सीढ़ी है। इसका प्रत्येक चरण पूर्णतः मन्त्र-बद्ध एवं तार्किक है।
1. आचमन एवं अंगस्पर्श (पवित्रीकरण)
यजमान यज्ञ-वेदी पर पूर्वाभिमुख होकर बैठता है। सर्वप्रथम वह जल से आचमन करता है। दायीं हथेली (ब्रह्मतीर्थ) में जल लेकर तीन बार जल का पान किया जाता है। यह त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति एवं त्रिलोक के वंदन का प्रतीक है :
प्रथम आचमन: ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा। (हे अविनाशी परमात्मन्! आप मेरे आधार हैं, यह जल अमृत के समान मेरे अंतःकरण को शुद्ध करे)।
द्वितीय आचमन: ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा। (हे प्रभो! आप मेरे रक्षक हैं)।
तृतीय आचमन: ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा। (मुझमें सत्य, यश और लक्ष्मी सदैव निवास करें) ।
आचमन के पश्चात यजमान बाएँ हाथ की हथेली में जल लेता है और दाहिने हाथ की मध्यमा एवं अनामिका उंगलियों से उस जल को स्पर्श करते हुए शरीर के विभिन्न ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को पवित्र और ऊर्जामय करने के लिए अंगस्पर्श करता है :
ॐ वाङ्म आस्येऽस्तु। (मेरे मुख में सत्य बोलने की वाणी हो - मुख का स्पर्श)।
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (मेरी नासिका में प्राणशक्ति दृढ़ हो - नासिका का स्पर्श)।
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। (मेरी आँखों में शुभ देखने की ज्योति हो - नेत्रों का स्पर्श)।
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (मेरे कानों में कल्याणकारी श्रवण शक्ति हो - कानों का स्पर्श)।
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (मेरी भुजाओं में सत्कर्म करने का बल हो - भुजाओं का स्पर्श)।
ॐ ऊर्वोर्म ओजोऽस्तु। (मेरी जंघाओं में ओज और स्थिरता हो - जंघाओं का स्पर्श)।
ॐ अरिष्टानि मे अङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (मेरा संपूर्ण शरीर और उसके सभी अंग रोगरहित और शक्ति-संपन्न हों - यह बोलकर संपूर्ण शरीर पर जल छिड़कना) ।
2. ईश्वर-स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना
आत्म-शुद्धि के पश्चात यजमान परब्रह्म परमात्मा की स्तुति करता है। वैदिक परंपरा में इसके लिए 8 विशिष्ट मन्त्रों का विधान है, जो ऋग्वेद एवं यजुर्वेद से संकलित हैं । इन मन्त्रों का गान करते हुए साधक अपना पूर्ण समर्पण ईश्वर के प्रति करता है। इनमें से प्रथम मन्त्र यजुर्वेद (30.3) का अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र है:
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥
अर्थ: हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्य युक्त, शुद्धस्वरूप परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुःखों को दूर कर दीजिए। जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वे सब हमको प्राप्त कराइए।
द्वितीय मन्त्र हिरण्यगर्भ सूक्त से है:
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
अर्थ: जो स्वप्रकाशस्वरूप है और सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान था, जो इस संपूर्ण उत्पन्न हुए जगत का एक ही स्वामी है, जिसने पृथ्वी से लेकर द्युलोक तक को धारण किया हुआ है, हम उस सुखस्वरूप परमात्मा की हविष्य (प्रेम और भक्ति) से उपासना करें।
इन मन्त्रों के सस्वर पाठ से यज्ञ मंडप का वातावरण पूर्णतः सात्विक एवं एकाग्र हो जाता है। तत्पश्चात यजमान देश, काल, तिथि, वार और गोत्र का उच्चारण करते हुए संकल्प ग्रहण करता है कि यह देव-यज्ञ किस उद्देश्य (यथा— आत्म-कल्याण, पर्यावरण शुद्धि, नवग्रह शांति) से किया जा रहा है ।
3. अग्नि प्रज्ज्वलन एवं स्थापन
पञ्चभूसंस्कार से शुद्ध किए गए कुंड में अब अग्नि देव का आवाहन और स्थापन किया जाता है। रुई या समिधा के छोटे टुकड़ों पर कपूर या गोघृत रखकर उसे दीपक से प्रज्वलित किया जाता है।
अग्नि प्रज्ज्वलन मन्त्र: ॐ भूर्भुवः स्वः बोलते हुए दीपक से अग्नि प्रज्वलित करें ।
अग्नि स्थापन मन्त्र: ॐ भूर्भुवः स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा। तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे॥
इस मन्त्र का भाव है कि जिस प्रकार द्युलोक अपनी विशालता से और पृथ्वी अपनी चौड़ाई से महान है, उसी प्रकार हे देवयजनि पृथ्वी! मैं तेरे पृष्ठ भाग पर अन्नों को भक्षण करने वाले (अन्नाद) अग्नि देव को अन्न-प्राप्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए स्थापित करता हूँ।
अग्नि प्रदीपन: जब अग्नि कुंड में स्थापित हो जाए, तो दोनों हाथ जोड़कर (प्रणाम मुद्रा में) अग्नि देव की स्तुति की जाती है और उन्हें प्रदीप्त होने का आवाहन किया जाता है: ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते सँसृजेथामयं च। अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत॥
4. समिधाधान (यज्ञीय काष्ठ अर्पित करना)
अग्नि को सुचारु रूप से प्रज्वलित करने और उसकी लपटों को स्थिर करने के लिए घी में डुबोई हुई तीन प्रादेश मात्र लंबी समिधाएं (लकड़ियाँ) विशेष मंत्रों के साथ अग्नि में अर्पित की जाती हैं । यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है:
प्रथम समिधा आहुति: ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम॥ (अर्थ: हे सर्वज्ञ अग्निदेव! यह समिधा आपकी आत्मा (भोजन) है। इससे आप प्रदीप्त हों और बढ़ें। आप हमें भी श्रेष्ठ प्रजा, पशुधन, ब्रह्मवर्चस (ज्ञान के तेज) और अन्नादि से समृद्ध करें)।
द्वितीय समिधा आहुति: ॐ समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा। इदमग्नये - इदन्न मम॥
तृतीय समिधा आहुति: ॐ सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे - इदन्न मम॥ ॐ तन्त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य स्वाहा। इदमग्नयेऽङ्गिरसे - इदन्न मम॥
5. पञ्चघृताहुति एवं जलप्रोक्षण
समिधाओं के प्रज्वलित हो जाने पर, अग्नि को घृत से पुष्ट करने के लिए पञ्चघृताहुति (केवल शुद्ध घी की पाँच आहुतियां) दी जाती हैं। इसके लिए पुनः ॐ अयन्त इध्म आत्मा... मंत्र का ही पाँच बार उच्चारण किया जाता है और प्रत्येक बार स्रुवा से घी की धार अग्नि के मध्य में अर्पित की जाती है ।
घृत की इन प्रारंभिक आहुतियों के बाद, अग्नि के अत्यधिक ताप को नियंत्रित करने, आसुरी शक्तियों के प्रवेश को रोकने तथा देव शक्तियों से यज्ञ की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए कुंड के चारों ओर जल का सिंचन किया जाता है, जिसे जलप्रोक्षण कहते हैं :
पूर्व दिशा में (बाएँ से दाएँ जल छिड़कते हुए): ॐ अदितेऽनुमन्यस्व। (हे अखंड सत्तामयी अदिति! हमें इस यज्ञ की अनुमति प्रदान करें)।
पश्चिम दिशा में (दाएँ से बाएँ): ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व। (हे ईश्वरीय कृपा रूपी अनुमति देवी! इस कार्य के लिए अपनी स्वीकृति दें)।
उत्तर दिशा में (दाएँ से बाएँ): ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व। (हे ज्ञान की देवी सरस्वती! हमें इस यज्ञ का विज्ञान समझने की अनुमति दें)।
कुंड के चारों ओर (तीनों दिशाओं को मिलाते हुए एक पूर्ण वृत्त में जल घुमाते हुए): ॐ देव सवितः प्र सुव यज्ञं प्र सुव यज्ञपतिं भगाय... (हे सविता देव! हमारे इस यज्ञ को और यज्ञपति (यजमान) को ऐश्वर्य की ओर प्रेरित करें) ।
6. आघारावाज्यभागाहुति का विशिष्ट विज्ञान
यह देव-यज्ञ का एक अत्यंत गूढ़ और वैज्ञानिक चरण है। 'आघार' का अर्थ है घृत की सतत धार, और 'आज्यभाग' का अर्थ है घी का वह भाग जो विशिष्ट देवताओं को अग्नि के विशिष्ट कोनों में दिया जाता है ।
जब यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित होती है, तो कुंड के विभिन्न भागों में तापमान असमान हो सकता है। ऋषियों ने वेदी के उत्तर, दक्षिण और मध्य भाग में घी की आहुति देने का विधान बनाया है ताकि अग्नि सम्यक् रूप से प्रज्वलित हो और ब्रह्मांड की मूल शक्तियों (ज्ञान, शांति, सृजन और पराक्रम) का पोषण हो:
वेदी के उत्तर भाग में (पश्चिम से पूर्व की ओर घृत की धार डालते हुए): ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये - इदन्न मम॥ (यह आहुति अग्नि अर्थात् ज्ञान व प्रकाश के देवता को समर्पित है)।
वेदी के दक्षिण भाग में (पश्चिम से पूर्व की ओर घृत की धार डालते हुए): ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय - इदन्न मम॥ (यह आहुति सोम अर्थात् चंद्रमा, शीतलता व शांति के देवता को समर्पित है)।
वेदी के ठीक मध्य भाग में: ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये - इदन्न मम॥ (यह आहुति सृष्टि के रचयिता प्रजापति को समर्पित है)।
वेदी के मध्य भाग में (पुनः): ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय - इदन्न मम॥ (यह आहुति त्रिलोकाधिपति और शक्ति के प्रतीक इंद्र को समर्पित है)।
अंतर्दृष्टि: इन चारों आहुतियों के अंत में बोला जाने वाला वाक्य "इदन्न मम" (यह मेरा नहीं है) भारतीय दर्शन का सार है । यह यजमान के अहंकार (मैं और मेरा) को भस्म करने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो कुछ भी मेरे पास है—वह धन, अन्न या ज्ञान हो—वह परमेश्वर का ही है और उसी को समर्पित है。
7. व्याहृति आहुति
'व्याहृति' का अर्थ है ब्रह्मांड का विस्तार। गायत्री मंत्र के आरंभ में आने वाले तीन शब्द (भूः, भुवः, स्वः) त्रिलोक के प्रतीक हैं। स्रुवा को घी से भरकर प्रज्वलित समिधाओं पर इन मंत्रों से चार आहुतियां दी जाती हैं :
ॐ भूरग्नये प्राणाय स्वाहा। इदमग्नये प्राणाय - इदन्न मम॥ (पृथ्वी लोक एवं प्राण वायु के निमित्त)।
ॐ भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा। इदं वायवेऽपानाय - इदन्न मम॥ (अंतरिक्ष लोक एवं अपान वायु के निमित्त)।
ॐ स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा। इदमादित्याय व्यानाय - इदन्न मम॥ (द्युलोक एवं व्यान वायु के निमित्त)।
ॐ भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा। इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः - इदन्न मम॥ (समस्त लोकों और वायु के निमित्त समेकित आहुति) ।
8. प्रातः एवं सायं कालीन मुख्य आहुतियां (प्रधान होम)
व्याहृति आहुतियों के पश्चात मुख्य हवन सामग्री (हविष्य) और घृत को मिलाकर प्रधान आहुतियां दी जाती हैं। श्रौत ग्रंथों के अनुसार प्रातःकाल और सायंकाल के लिए आहुति के मंत्र भिन्न होते हैं, क्योंकि दोनों समय ब्रह्मांडीय शक्तियों का स्वरूप भिन्न होता है ।
प्रातःकालीन आहुतियाँ: प्रातःकाल में सूर्य का प्राधान्य होता है。
ॐ सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा॥ (सूर्य ही ज्योति है, और ज्योति ही सूर्य है)।
ॐ सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा॥
ॐ ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा॥ (यह मंत्र प्रायः मौन रहकर दिया जाता है क्योंकि यह प्रथम मंत्र की ही पुनरावृत्ति है) ।
ॐ सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या। जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा॥ (अर्थ: देव रूपी परमात्मा द्वारा उत्पन्न सूर्य, जो उषा काल के साथ मिलकर सबको प्रकाश देता है, वह मेरी आहुति को प्रेमपूर्वक ग्रहण करे)।
सायंकालीन आहुतियाँ: सायंकाल में सूर्य छिप जाता है, अतः अग्नि का प्राधान्य होता है。
ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा॥
ॐ अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा॥
ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा॥ (मौन रहकर)।
ॐ सजूर्देवेन सवित्र सजू रात्र्येन्द्रवत्या। जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा॥
इसके अतिरिक्त, सामान्य देव-यज्ञ में गायत्री मंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात स्वाहा) तथा महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् स्वाहा) से विशेष आहुतियां (कम से कम 11 या 21 बार) दी जाती हैं, जिससे बुद्धि का परिष्कार और दीर्घायु की प्राप्ति होती है ।
बुद्धि और मेधा की प्राप्ति के लिए एक विशेष मंत्र का भी विधान है: ॐ यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते। तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा॥ (अर्थ: हे अग्निदेव! जिस मेधा की देवगण और पितर उपासना करते हैं, उसी मेधा से आज मुझे मेधावी (बुद्धिमान) करें)।
'स्वाहा' शब्द का निरुक्त, उत्पत्ति एवं शास्त्रीय महत्त्व
प्रत्येक आहुति को अग्नि में डालते समय 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण अनिवार्य है। धर्मशास्त्रों और पुराणों के अनुसार, 'स्वाहा' के बिना कोई भी आहुति या हविष्य देवताओं तक नहीं पहुँचता, और वह यज्ञ निष्फल (फलहीन) माना जाता है ।
निरुक्त एवं शाब्दिक अर्थ
व्याकरण और निरुक्त की दृष्टि से 'स्वाहा' शब्द की उत्पत्ति दो प्रकार से मानी गई है:
- सु + अहा: इसका अर्थ है "सही रीति से पहुँचाना" या "उत्तम हवि"। जिस प्रकार एक रॉकेट किसी उपग्रह को अंतरिक्ष में निर्धारित गंतव्य तक पहुँचाता है, उसी प्रकार 'स्वाहा' वह ध्वनि-ऊर्जा या वाहक (Carrier) है जो भौतिक हविष्य को सूक्ष्म ऊर्जा में बदलकर लक्षित देवता तक सुरक्षित पहुँचाती है ।
- स्व + हा: 'स्व' का अर्थ है अपना (स्वार्थ) और 'हा' का अर्थ है त्याग करना। अर्थात् आहुति देते समय अपने स्वार्थ, लोभ और अहंकार का पूर्णतः त्याग कर देना ही सच्चा 'स्वाहा' है ।
पौराणिक पृष्ठभूमि
श्रीमद्भागवत एवं शिव पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ काल में ब्राह्मणों द्वारा दी जाने वाली आहुतियां देवताओं तक नहीं पहुँच पा रही थीं, जिससे देवता क्षुधा-पीड़ित हो गए। तब ब्रह्मा जी के अनुनय पर मूल-प्रकृति के अंश से 'स्वाहा' देवी का प्राकट्य हुआ। स्वाहा प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उनका विवाह साक्षात् अग्निदेव के साथ संपन्न हुआ ।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वाहा देवी को यह वरदान दिया कि अग्निदेव की दाहिका (जलाने वाली) शक्ति के रूप में वे ही यज्ञ-भाग को ग्रहण कर देवताओं का पोषण करेंगी । स्वाहा के बिना अग्निदेव हविष्य को भस्म करने या उसे देवताओं तक प्रेषित करने में असमर्थ हैं। अग्निदेव और स्वाहा के मिलन से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो यज्ञीय अग्नि के ही विभिन्न स्वरूप हैं । अतः 'स्वाहा' का उच्चारण करते समय साधक को यह भावना रखनी चाहिए कि वह अग्निदेव की शक्ति का आवाहन कर रहा है और हव्य पदार्थ को देवताओं के आहार के रूप में परिपक्व (भस्म) करने की विनती कर रहा है。
स्विष्टकृदाहुति एवं पूर्णाहुति विधान
यज्ञ के समापन की ओर बढ़ते हुए दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण आहुतियां दी जाती हैं, जो सम्पूर्ण कर्मकांड को पूर्णता और दोष-मुक्ति प्रदान करती हैं।
1. स्विष्टकृदाहुति (प्रायश्चित्त आहुति)
मानव स्वभाव वश यज्ञ करते समय मंत्रों के उच्चारण में, सामग्री की मात्रा में, या यज्ञीय विधि में कोई न्यूनता (कमी) या अधिकता रह सकती है। उस त्रुटि के निवारण और प्रायश्चित्त के लिए 'स्विष्टकृत्' आहुति दी जाती है । यह आहुति प्रायः मिष्ठान, खीर या भात (ओदन) से दी जाती है। मन्त्र: ॐ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते इदन्न मम॥ भावार्थ: हे स्विष्टकृत् (उत्तम रूप से यज्ञ संपन्न कराने वाले) अग्निदेव! इस कर्म में मैंने जो कुछ अधिक कर दिया हो या जो न्यून रह गया हो, आप उसे पूर्ण कर दें। मेरे सभी प्रायश्चित्तों को स्वीकार कर मेरी कामनाओं को पूर्ण करें。
2. पूर्णाहुति (विराट पूर्णता का प्रतीक)
यज्ञ की चरम परिणति पूर्णाहुति है। यह इस बात का दार्शनिक प्रतीक है कि परमात्मा पूर्ण है, यह सृष्टि पूर्ण है, और यह यज्ञ भी अपने চরম रूप में पूर्ण है। थाली में बची हुई सम्पूर्ण हवन सामग्री, घृत, पान, सुपारी, लौंग, इलायची और गोला (सूखा नारियल) को एक साथ वेदी में समर्पित कर दिया जाता है । नारियल (श्रीफल) का समर्पण अपने भीतर के संपूर्ण अहंकार और मलिनता को अग्नि में होम कर देने का प्रतीक है । मन्त्र: ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ सर्वं वै पूर्णं स्वाहा॥ (इस मंत्र की तीन बार आहुति दी जाती है) । भावार्थ: वह परब्रह्म पूर्ण है, यह चराचर जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी अंत में पूर्ण ही शेष बचता है。
विशिष्ट अनुष्ठानों और वृहद् यज्ञों में पूर्णाहुति के समय 'वसोर्धारा' दी जाती है। इसमें स्रुवा की सहायता से लगातार बिना टूटे घी की एक धार अग्नि में अर्पित की जाती है। इसका मंत्र है: ॐ वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारं... स्वाहा ।
हवन के पश्चात की शास्त्रीय क्रियाएं
पूर्णाहुति के साथ ही अग्नि में आहुति देने का कार्य समाप्त हो जाता है, परंतु यजमान के लिए कुछ अन्य कर्म शेष रहते हैं, जिनके बिना यज्ञ का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
1. शांति पाठ एवं जल सिंचन
यज्ञ कुंड की ऊष्मा को शांत करने और समस्त ब्रह्मांड में शांति की कामना के लिए 'शांति पाठ' किया जाता है। मन्त्र: ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ इसके उपरांत यजमान एक पुष्प या आम्र पल्लव की सहायता से यज्ञवेदी के जल को पूरे घर में छिड़कता है, जिससे घर में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है ।
2. क्षमा प्रार्थना एवं आसन-जल वंदन (इन्द्र वंदन)
शास्त्रीय मान्यता है कि यज्ञ का फल तब तक सुरक्षित नहीं होता जब तक आसन के नीचे जल लगाकर इन्द्र को वंदन न किया जाए। यजमान अपने आसन के नीचे भूमि पर थोड़ा जल छोड़ता है और उस जल को अनामिका उंगली से स्पर्श कर अपने मस्तक और नेत्रों पर लगाता है। मन्त्र: ॐ इन्द्राय नमः अथवा ॐ शक्राय नमः । यदि यह क्रिया न की जाए, तो मान्यता है कि देवराज इन्द्र उस यज्ञ का सम्पूर्ण पुण्य फल हर लेते हैं। इसके पश्चात भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए अज्ञानतावश हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगी जाती है: ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
3. भस्म धारण (यज्ञीय रक्षा-कवच)
हवन के पूर्ण होने पर कुंड से थोड़ी भस्म (राख) ली जाती है और उसे विशिष्ट मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर शरीर के विभिन्न अंगों पर धारण किया जाता है। भस्म इस बात का प्रतीक है कि मानव शरीर का अंतिम सत्य भी यही राख है, और यज्ञीय भस्म साधक के लिए एक अभेद्य रक्षा-कवच (Armor) का कार्य करती है। मन्त्र: ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्॥ भस्म को अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र कर मध्यमा और अनामिका उंगलियों से बायीं ओर से प्रारंभ कर दाहिनी ओर ललाट (माथे), ग्रीवा (कंठ), दक्षिण बाहुमूल (भुजाओं), और हृदय पर लगाया जाता है । शिव पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति नित्य भस्म धारण करता है, उसे संपूर्ण तीर्थों और यज्ञों का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है ।
4. ब्राह्मण भोजन एवं दान-दक्षिणा विधान
भारतीय धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट उद्घोष है कि कोई भी यज्ञ, अनुष्ठान या संस्कार तब तक निष्फल रहता है जब तक कि उसमें उचित दान-दक्षिणा का विधान न किया जाए । यजमान को चाहिए कि वह यज्ञ संपन्न कराने वाले आचार्य (पुरोहित) का आदरपूर्वक सत्कार करे। दान सामग्री में धोती, दुपट्टा, अंगोछा, पंचपात्र, यज्ञोपवीत, आसन, फल, मिष्ठान और यथायोग्य सुवर्ण या रजत (धन) दक्षिणा के रूप में अवश्य देना चाहिए। अंत में समस्त उपस्थित मण्डली को प्रसाद वितरित कर आरती की जाती है।
देव-यज्ञ की फल-श्रुति एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य
हवन की यह सुदीर्घ शास्त्रीय प्रक्रिया केवल मनोवैज्ञानिक संतुष्टि या रूढ़िवादी परंपरा नहीं है; इसके पीछे गहन वैज्ञानिक सत्य छिपे हैं。
आध्यात्मिक फल (श्रुति): शास्त्रों के अनुसार, नित्य देव-यज्ञ करने वाले व्यक्ति के घर में देवताओं का सानिध्य होता है, पापों का शमन होता है, और चित्त की वृत्तियां शुद्ध होती हैं । "इदन्न मम" का निरंतर अभ्यास व्यक्ति को स्वार्थ से परमार्थ की ओर, और व्यष्टि (Individual) से समष्टि (Cosmos) की ओर ले जाता है। गायत्री मंत्र और मृत्युंजय मंत्र की आहुतियों से व्यक्ति के प्रभामंडल (Aura) में सकारात्मकता और आत्मिक बल का संचार होता है ।
वैज्ञानिक महात्म्य: आधुनिक विज्ञान भी हवन के लाभों की पुष्टि करता है। फ्रांस के वैज्ञानिक ट्रेले (Trele) के शोध के अनुसार, हवन में जब आम की समिधा जलती है, तो उससे 'फॉर्मिक एल्डिहाइड' (Formic Aldehyde) नामक गैस उत्पन्न होती है, जो वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं और विषाणुओं का नाश करती है । इसी प्रकार, राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), लखनऊ के एक विस्तृत वैज्ञानिक शोध में यह प्रमाणित हुआ है कि यदि आधा किलो उत्तम हवन सामग्री (जड़ी-बूटियों का मिश्रण) और आम की लकड़ी को जलाया जाए, तो मात्र एक घंटे के भीतर कक्ष के 94% हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। और इसका सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इस औषधीय धुएं का प्रभाव वातावरण में 30 दिनों तक बना रहता है, जिससे नए कीटाणु पनप नहीं पाते । पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज के प्रयोग भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अग्निहोत्र के कारण 96% तक हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं ।
यज्ञ में डाली जाने वाली सुगन्धित और रोगनाशक वनस्पतियां अग्नि के तीव्र ताप में आकर सूक्ष्म परमाणुओं में विभक्त हो जाती हैं। जिस प्रकार लाल मिर्च को अग्नि में डालने पर उसका प्रभाव अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में तीव्र गति से फैल जाता है, ठीक उसी प्रकार हवन सामग्री के औषधीय गुण अग्नि के माध्यम से गैसीय रूप धारण कर श्वसन-तंत्र के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं और रक्त, मज्जा आदि को पुष्ट करते हैं ।
निष्कर्ष
वेदों, ब्राह्मण-ग्रंथों, गृह्यसूत्रों और स्मृतियों में वर्णित 'देव-यज्ञ' अथवा हवन की यह संपूर्ण प्रक्रिया भारतीय मनीषा की एक अत्यंत परिष्कृत और वैज्ञानिक देन है। पञ्चभूसंस्कार के द्वारा भूमि की शुद्धि से लेकर, नवग्रहों के अनुकूल समिधाओं का चयन, आघारावाज्यभागाहुति द्वारा अग्नि के ताप का संतुलन, और 'स्वाहा' द्वारा स्वार्थ के विसर्जन तक का प्रत्येक चरण अत्यंत तार्किक और सोद्देश्य है। यह प्रक्रिया केवल वायुमंडल के प्रदूषण को ही दूर नहीं करती, अपितु मानव मन के भीतर व्याप्त अज्ञान, काम, क्रोध और लोभ रूपी प्रदूषण को भी भस्म कर देती है。
अतः आधुनिक युग में भी, यदि कोई साधक पूर्ण शास्त्रीय नियमों, शुद्ध हविष्य और अडिग श्रद्धा के साथ इस देव-यज्ञ को अपने दैनिक जीवन का अंग बनाता है, तो वह निश्चित ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरुषार्थों को सरलता से सिद्ध कर सकता है। चराचर जगत के रक्षण एवं पोषण का यह यज्ञीय मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि सहस्रों वर्ष पूर्व वैदिक काल में था।






