विस्तृत उत्तर
यज्ञ की प्रक्रिया केवल आहुति देने तक सीमित नहीं है; यह यजमान के शरीर, मन और आत्मा को ब्रह्मांड से जोड़ने की एक यौगिक सीढ़ी है।
यजमान यज्ञ-वेदी पर पूर्वाभिमुख होकर बैठता है। सर्वप्रथम वह जल से आचमन करता है। दायीं हथेली (ब्रह्मतीर्थ) में जल लेकर तीन बार जल का पान किया जाता है। यह त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति एवं त्रिलोक के वंदन का प्रतीक है।
आचमन के पश्चात यजमान अंगस्पर्श करता है। फिर ईश्वर स्तुति और संकल्प लेता है। इसके बाद पञ्चभूसंस्कार से शुद्ध कुंड में अग्नि देव का आवाहन और स्थापन किया जाता है।


