विस्तृत उत्तर
यजमान यज्ञ-वेदी पर पूर्वाभिमुख होकर बैठता है। सर्वप्रथम वह जल से आचमन करता है। दायीं हथेली (ब्रह्मतीर्थ) में जल लेकर तीन बार जल का पान किया जाता है। यह त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति एवं त्रिलोक के वंदन का प्रतीक है।
प्रथम आचमन: ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा। (हे अविनाशी परमात्मन्! आप मेरे आधार हैं, यह जल अमृत के समान मेरे अंतःकरण को शुद्ध करे)।
द्वितीय आचमन: ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा। (हे प्रभो! आप मेरे रक्षक हैं)।
तृतीय आचमन: ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा। (मुझमें सत्य, यश और लक्ष्मी सदैव निवास करें)।
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