विस्तृत उत्तर
इन चारों आहुतियों के अंत में बोला जाने वाला वाक्य 'इदन्न मम' (यह मेरा नहीं है) भारतीय दर्शन का सार है। यह यजमान के अहंकार (मैं और मेरा) को भस्म करने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो कुछ भी मेरे पास है — वह धन, अन्न या ज्ञान हो — वह परमेश्वर का ही है और उसी को समर्पित है।





