विस्तृत उत्तर
आचमन के पश्चात यजमान बाएँ हाथ की हथेली में जल लेता है और दाहिने हाथ की मध्यमा एवं अनामिका उंगलियों से उस जल को स्पर्श करते हुए शरीर के विभिन्न ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को पवित्र और ऊर्जामय करने के लिए अंगस्पर्श करता है।
यह क्रिया शरीर के प्रत्येक अंग को यज्ञ के योग्य, पवित्र और ऊर्जावान बनाने के लिए की जाती है, ताकि संपूर्ण यजमान यज्ञ के लिए एक उचित पात्र बन सके।

