विस्तृत उत्तर
अग्नि को सुचारु रूप से प्रज्वलित करने और उसकी लपटों को स्थिर करने के लिए घी में डुबोई हुई तीन प्रादेश मात्र लंबी समिधाएं (लकड़ियाँ) विशेष मंत्रों के साथ अग्नि में अर्पित की जाती हैं।
प्रथम समिधा आहुति: 'ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम॥'
(अर्थ: हे सर्वज्ञ अग्निदेव! यह समिधा आपकी आत्मा (भोजन) है। इससे आप प्रदीप्त हों और बढ़ें। आप हमें भी श्रेष्ठ प्रजा, पशुधन, ब्रह्मवर्चस (ज्ञान के तेज) और अन्नादि से समृद्ध करें)।
द्वितीय समिधा आहुति: 'ॐ समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा। इदमग्नये - इदन्न मम॥'
तृतीय समिधा आहुति: 'ॐ सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे - इदन्न मम॥'
ॐ तन्त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य स्वाहा। इदमग्नयेऽङ्गिरसे - इदन्न मम॥

