विस्तृत उत्तर
यह देव-यज्ञ का एक अत्यंत गूढ़ और वैज्ञानिक चरण है। 'आघार' का अर्थ है घृत की सतत धार, और 'आज्यभाग' का अर्थ है घी का वह भाग जो विशिष्ट देवताओं को अग्नि के विशिष्ट कोनों में दिया जाता है।
जब यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित होती है, तो कुंड के विभिन्न भागों में तापमान असमान हो सकता है। ऋषियों ने वेदी के उत्तर, दक्षिण और मध्य भाग में घी की आहुति देने का विधान बनाया है ताकि अग्नि सम्यक् रूप से प्रज्वलित हो और ब्रह्मांड की मूल शक्तियों (ज्ञान, शांति, सृजन और पराक्रम) का पोषण हो:
— वेदी के उत्तर भाग में: 'ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये - इदन्न मम॥' (अग्नि अर्थात् ज्ञान व प्रकाश के देवता को)
— वेदी के दक्षिण भाग में: 'ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय - इदन्न मम॥' (सोम अर्थात् चंद्रमा, शीतलता व शांति के देवता को)
— वेदी के ठीक मध्य भाग में: 'ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये - इदन्न मम॥' (सृष्टि के रचयिता प्रजापति को)
— वेदी के मध्य भाग में पुनः: 'ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय - इदन्न मम॥' (त्रिलोकाधिपति और शक्ति के प्रतीक इंद्र को)
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