📖
विस्तृत उत्तर
हिरण्यगर्भ सूक्त का मंत्र:
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत। स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
अर्थ: जो स्वप्रकाशस्वरूप है और सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान था, जो इस संपूर्ण उत्पन्न हुए जगत का एक ही स्वामी है, जिसने पृथ्वी से लेकर द्युलोक तक को धारण किया हुआ है, हम उस सुखस्वरूप परमात्मा की हविष्य (प्रेम और भक्ति) से उपासना करें।
🔗
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक
इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें
क्या यह उत्तर सहायक था?





