प्रत्यंगिरा देवी मूल मंत्र एवं विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र
प्रत्यंगिरा देवी मूल मंत्र एवं विपरीत
प्रत्यंगिरा मंत्र (शत्रु नाश एवं परप्रयोग खंडन हेतु)
मूलमंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं स्फ्रें हूं प्रत्यंगिरे मम शत्रून् स्फारय−स्फारय मारय मारय हूं फट् स्वाहा ।
विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यंगिरे मम रक्ष रक्ष मम शत्रून् भंजय−भंजय फे हुं फट् स्वाहा ।
देवता: प्रत्यंगिरा
देवी (भद्रकाली का अत्यंत उग्र स्वरूप, नृसिंह की शक्ति)
स्रोत: तांत्रिक
परंपरा (स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं)
प्रयोजन: मूलमंत्र
शत्रुओं के नाश व अभिचार कर्म के खंडन हेतु, विपरीत मंत्र शत्रु समूह
के विनाश व शत्रु के कुप्रयोगों को वापस भेजने के लिए
विधि:
- इन मंत्रों की साधना भगवती काली के मंदिर या श्मशान में विधिवत् जप तथा होम द्वारा करें।
- श्मशान साधना केवल उच्च कोटि के साधकों के लिए है।
- शांति के लिए श्वेत, आकर्षण हेतु लाल, स्तंभन के लिए पीले, उच्चाटन-मारण हेतु काले पुष्पों का प्रयोग करें।
- यह साधना अत्यंत उग्र है, अतः सदैव गुरु मार्गदर्शन में ही करें।
महत्व:
प्रत्यंगिरा देवी को अथर्वण भद्रकाली भी कहा जाता है और इनकी साधना अत्यंत गोपनीय
एवं शक्तिशाली मानी जाती है। ‘प्रति’ अर्थात् विपरीत लौटाना और
‘अंगिरा’ अर्थात् आक्रमण करना, इस प्रकार यह देवी शत्रु द्वारा किये गए
अभिचार कर्मों को उसी पर लौटा देने की क्षमता रखती हैं। इनका सिंहमुखी
स्वरूप और उग्र स्वभाव इन्हें विशेष रूप से मारण, मोहन, उच्चाटन आदि
तांत्रिक क्रियाओं में प्रभावी बनाता है, परंतु इनका प्रयोग अत्यंत सावधानी
एवं नैतिक सीमाओं के भीतर ही करना चाहिए।