श्रीमद्भागवतभीष्म के अनुसार कृष्ण एक होकर भी अनेक कैसे दिखते हैं?भीष्म ने सूर्य का उदाहरण दिया: जैसे एक सूर्य अनेक आँखों से अनेक दिखता है, वैसे एक कृष्ण अनेक हृदयों में अनेक रूप से जान पड़ते हैं।#कृष्ण#परमात्मा#भीष्म स्तुति
श्रीमद्भागवतभीष्म के अनुसार कृष्ण नारायण कैसे हैं?भीष्म के अनुसार कृष्ण साक्षात आदिपुरुष नारायण हैं, जो यदुवंश में छिपकर लीला करते हैं और सबके आत्मा हैं।#कृष्ण नारायण#भीष्म#परमात्मा
श्रीमद्भागवतभीष्म पितामह ने कृष्ण को भगवान क्यों माना?भीष्म ने कृष्ण को भगवान इसलिए माना क्योंकि वे साक्षात नारायण, सबके आदिकारण, सर्वात्मा और अनन्य भक्तों पर कृपा करने वाले परमात्मा हैं।#भीष्म#कृष्ण भगवान#नारायण
शिव ध्यानहृदयकमल में शिव का ध्यान कैसे करना चाहिए?हृदयकमल की कर्णिका में दीपशिखा जैसी आकृति वाले ओंकार नामक परमात्मा का ध्यान करना चाहिए।#हृदयकमल#शिव ध्यान#दीपशिखा
श्रीमद्भागवतशुकदेव जी इतने बड़े योगी क्यों माने जाते हैं?वे समदर्शी, भेदभावरहित, परमात्मा में स्थित और इतनी विरक्त दृष्टि वाले थे कि स्त्री-पुरुष भेद भी नहीं देखते थे।#शुकदेव योगी#वैराग्य#समदर्शी
श्रीमद्भागवतभगवान का अनुभव कैसे होता है?भागवत श्रवण से प्राप्त ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्ति और प्रेममयी भक्ति से भगवान के तत्त्व का अनुभव होता है।#भगवान अनुभव#परमात्मा#भक्ति
श्रीमद्भागवतभागवत पुराण में परम सत्य किसे कहा गया है?परम सत्य उस स्वयंप्रकाश परमात्मा को कहा गया है, जिससे जगत की सृष्टि, स्थिति और लय होते हैं।#परम सत्य#परमात्मा#सृष्टि
प्रलयप्रलय के बाद क्या बचता है?प्रलय के बाद केवल प्रधान यानी प्रकृति और पुरुष रह जाते हैं।#प्रलय#प्रधान#प्रकृति
शिव तत्त्वनिर्गुण शिव क्या है?निर्गुण शिव वह अलिंग तत्त्व है जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और गुणों से रहित है।#निर्गुण शिव#अलिंग#परमात्मा
शिव तत्त्वसदाशिव को परमात्मा क्यों कहा गया है?क्योंकि सदाशिव को सृष्टि, स्थिति और अंत का कारण तथा ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपात्मक कहा गया है।#सदाशिव#परमात्मा#सृष्टि
शिव तत्त्वसदाशिव कौन हैं?सदाशिव जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और अंत के कारण परमात्मा के रूप में वर्णित हैं।#सदाशिव#परमात्मा#शिव तत्त्व
लोकक्षीरोदकशायी विष्णु कौन हैं?वे हर जीव के हृदय में परमात्मा रूप से स्थित विष्णु हैं।#क्षीरोदकशायी विष्णु#परमात्मा#हृदय
हवन विधिहिरण्यगर्भ सूक्त मंत्र का क्या अर्थ है?हिरण्यगर्भ सूक्त का अर्थ: जो स्वप्रकाशस्वरूप, सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान, सम्पूर्ण जगत का एकमात्र स्वामी और पृथ्वी से द्युलोक तक को धारण करने वाले हैं — उस सुखस्वरूप परमात्मा की हविष्य (प्रेम और भक्ति) से उपासना करें।#हिरण्यगर्भ सूक्त#मंत्र अर्थ#परमात्मा
भक्ति एवं आध्यात्मआत्मा और परमात्मा में क्या अंतर है?आत्मा हर जीव का अमर चेतन तत्व है; जीवात्मा माया-बद्ध आत्मा है; परमात्मा सर्वव्यापी ब्रह्म है। अद्वैत वेदांत के अनुसार आत्मा और परमात्मा मूलतः एक ही हैं।#आत्मा#परमात्मा#जीवात्मा
सनातन सिद्धांतपरमात्मा क्या है?परमात्मा वह सर्वोच्च, सर्वव्यापी और असीमित चेतना है जो तीनों लोकों में व्याप्त है। गीता (15/17) में उसे सबका धारण-पोषण करने वाला अविनाशी ईश्वर कहा गया है। वह सत्-चित्-आनंद स्वरूप है।#परमात्मा#ईश्वर#सर्वव्यापी
दर्शनजीवात्मा और परमात्मा में क्या अंतर है?मुण्डक उपनिषद (3.1.1): दो पक्षी — जीवात्मा (फल खाता) और परमात्मा (साक्षी)। जीवात्मा = अणु, कर्मबद्ध, माया प्रभावित। परमात्मा = सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, माया स्वामी। गीता (15.7): जीव ईश्वर का अंश। अद्वैत: दोनों एक, द्वैत: सदा भिन्न।#जीवात्मा#परमात्मा#अंतर