विस्तृत उत्तर
जीवात्मा और परमात्मा का संबंध हिंदू दर्शन का केंद्रीय विषय है। विभिन्न दर्शनों में इसकी भिन्न-भिन्न व्याख्या है।
मुण्डक उपनिषद (3.1.1) — दो पक्षी उदाहरण
*'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया...'*
— एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। एक (जीवात्मा) फल खा रहा है (कर्मफल भोग रहा है), दूसरा (परमात्मा) केवल साक्षी रूप में देख रहा है, फल नहीं खाता।
अंतर
| विषय | जीवात्मा | परमात्मा |
|-------|----------|----------|
| स्वरूप | अणु (सूक्ष्म) | विभु (सर्वव्यापक) |
| ज्ञान | सीमित, अज्ञान से आवृत | सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान |
| कर्मबंधन | कर्मों से बंधा | कर्मों से मुक्त |
| भोग | कर्मफल भोगता है | साक्षी, अभोक्ता |
| माया | माया से प्रभावित | माया का स्वामी |
| गीता संदर्भ | 15.7: 'ममैवांशो जीवलोके' — मेरा अंश | 13.2: 'क्षेत्रज्ञ' — शरीर का ज्ञाता |
विभिन्न दर्शन
- ▸अद्वैत (शंकर): जीवात्मा = परमात्मा, भेद केवल अज्ञान (माया) के कारण। ज्ञान होने पर भेद समाप्त = मोक्ष।
- ▸विशिष्टाद्वैत (रामानुज): जीवात्मा परमात्मा का अंश, भिन्न पर निर्भर। शरीर-आत्मा संबंध।
- ▸द्वैत (मध्व): जीवात्मा और परमात्मा सदा भिन्न। मोक्ष में भी भेद बना रहता है।
सरल भाषा में: परमात्मा = समुद्र, जीवात्मा = बूंद। बूंद समुद्र का अंश है, पर समुद्र जितनी नहीं। अद्वैत कहता है — बूंद समुद्र में मिलकर समुद्र ही हो जाती है (मोक्ष)।





