विस्तृत उत्तर
विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट + अद्वैत = Qualified Non-dualism / योग्य अद्वैत) आचार्य रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) द्वारा प्रतिपादित वेदांत दर्शन है।
मूल सिद्धांत
ब्रह्म एक ही है, परंतु वह विशिष्ट गुणों से युक्त (सगुण) है। जीव (चित्) और जगत (अचित्) ब्रह्म से भिन्न होते हुए भी ब्रह्म के अंश/विशेषण हैं — जैसे शरीर आत्मा से भिन्न है पर आत्मा के बिना शरीर निरर्थक है।
शंकर से भिन्नता
- ▸शंकर: जगत मिथ्या, ब्रह्म निर्गुण।
- ▸रामानुज: जगत सत्य है (मिथ्या नहीं) — ब्रह्म ने इसकी रचना की है, अतः यह मिथ्या नहीं हो सकता। ब्रह्म सगुण है।
तीन तत्व
- 1ईश्वर (ब्रह्म) — सर्वोच्च, सगुण, नारायण/विष्णु = परम ब्रह्म।
- 2चित् (जीवात्मा) — ब्रह्म का अंश, चेतन, अनंत, पर ब्रह्म पर निर्भर।
- 3अचित् (जड़ जगत) — प्रकृति/पदार्थ, ब्रह्म द्वारा रचित, सत्य।
उपमा
- ▸जैसे वृक्ष की शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल वृक्ष के अंग हैं पर वृक्ष से भिन्न भी — वैसे ही जीव और जगत ब्रह्म के विशेषण (अंग) हैं।
- ▸जैसे सूर्य और किरणें — किरणें सूर्य से भिन्न हैं पर सूर्य के बिना असंभव।
मोक्ष
- ▸भक्ति और प्रपत्ति (शरणागति) से मोक्ष।
- ▸मोक्ष = वैकुंठ में नारायण की सेवा (सायुज्य नहीं, सामीप्य/सारूप्य)।
- ▸जीव मोक्ष में भी अपनी पृथक पहचान रखता है (शंकर के अद्वैत से भिन्न)।
माया विषयक दृष्टिकोण
रामानुज ने शंकर के 'मायावाद' का खंडन किया — माया ईश्वर की शक्ति है, भ्रम नहीं। जगत ईश्वर का वास्तविक विकार (परिणाम) है।


