महाकाल संहिता के आलोक में आदिशक्ति कालकाली: स्वरूप, उपासना एवं परम मंत्र का दिव्य विवेचन
मंगलाचरण एवं आदिशक्ति महाकाली का तात्विक रहस्य
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
सनातन धर्म के अनंत आकाश में जहाँ ज्ञान के असंख्य नक्षत्र देदीप्यमान हैं, वहीं आदिशक्ति महाकाली उस परम सत्य का प्रतीक हैं जो समस्त सृष्टि के आरंभ से पूर्व भी विद्यमान थीं और महाप्रलय के पश्चात् भी अकेली ही शेष रहती हैं। वे केवल एक देवी नहीं, अपितु स्वयं परम ब्रह्म हैं, जिन्हें तंत्र शास्त्र पराशक्ति के रूप में पूजता है। साधारण दृष्टि से उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर, रौद्र और उग्र प्रतीत हो सकता है, परंतु तत्वज्ञानी और भक्तजन यह भली-भाँति जानते हैं कि माँ का यह स्वरूप उनके असीम करुणा का ही एक पक्ष है।
महाकाली 'काल' अर्थात् समय की अधिष्ठात्री हैं। वस्तुतः वे काल से परे हैं, वे ही काल को उत्पन्न करती हैं, उसका संचालन करती हैं और अंत में उसी काल का भक्षण कर स्वयं में विलीन कर लेती हैं। उनका श्याम वर्ण किसी भौतिक रंग का द्योतक नहीं, अपितु उनकी निर्गुण, निराकार और अनंत प्रकृति का प्रतीक है, जहाँ सृष्टि के समस्त रंग और रूप विलीन हो जाते हैं। उनका विनाशकारी स्वरूप वास्तव में मुक्ति का मार्ग है। वे असुरों का, अधर्म का और अहंकार का विनाश करती हैं। अपने साधक के अंतःकरण में बैठे मोह, माया, क्रोध और भय रूपी असुरों का संहार करके वे उसे मोक्ष का अधिकारी बनाती हैं । अतः, उनका भयभीत करने वाला स्वरूप वस्तुतः भक्तों के लिए अभय प्रदान करने वाला है, क्योंकि जहाँ माँ का वास हो, वहाँ भय का कोई स्थान नहीं रहता।
महाकाल संहिता और नवकाली का प्राकट्य
आदिशक्ति के इन गुह्य और गहन स्वरूपों का ज्ञान हमें जिन प्रामाणिक शास्त्रों से प्राप्त होता है, उनमें 'महाकाल संहिता' का स्थान सर्वोपरि है। यह कोई साधारण ग्रंथ नहीं, अपितु स्वयं भगवान आदिनाथ शिव द्वारा प्रकट किया गया एक विशाल तंत्र-शास्त्र है, जिसमें पचास हजार श्लोक समाहित हैं। यह ग्रंथ मुख्यतः शक्ति की वाममार्गी उपासना का अद्भुत और विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है, यद्यपि इसमें दक्षिण मार्ग की विधियों का भी उल्लेख मिलता है।
देवी कालकाली का शास्त्र-वर्णित स्वरूप
कालकाली: काल को भी भक्षण करने वाली शक्ति
'कालकाली' नाम स्वयं में अत्यंत गहरा तात्विक अर्थ छिपाए हुए है। 'काली' शब्द का एक अर्थ है 'काल का भक्षण करने वाली'। जब इस नाम के साथ पुनः 'काल' जुड़ जाता है, तो यह 'कालकाली' बन जाता है, जिसका गूढ़ार्थ है—'वे शक्ति जो स्वयं काल (महाकाल) का भी भक्षण कर लेती हैं'। यह देवी की उस परम अवस्था का द्योतक है, जहाँ वे महाप्रलय के समय अपने भैरव महाकाल को भी स्वयं में विलीन कर लेती हैं और एकमात्र अद्वैत तत्व के रूप में शेष रह जाती हैं। वे वह परम शून्य हैं, जहाँ से समय का जन्म होता है और अंत में उसी में समा जाता है।
यद्यपि वे नवकाली में से एक पूजनीय स्वरूप हैं, तथापि 'महाकाल संहिता' में उनके जिस स्वरूप का सर्वाधिक विस्तृत, रहस्यमयी और शक्तिशाली वर्णन मिलता है, वह 'कामकला काली' का है, जिन्हें इस ग्रंथ की मुख्य प्रतिपाद्य देवी माना गया है।
काल काली: महाकाल संहिता में वर्णित परम स्वरूप
वर्ण एवं आकृति: उनका वर्ण प्रलयंकारी मेघ के समान श्याम है और वे जवाकुसुम के पुष्प की भाँति रक्तिम आभा से युक्त हैं। उनके नेत्र मदमस्त कोयल की तरह हैं और देह पके हुए जामुन के फल के समान है। उनके घने, बिखरे हुए केश लंबे होकर उनके चरणों तक पहुँचते हैं। यह स्वरूप उनकी अनंत, निराकार और अदम्य प्रकृति को दर्शाता है।
भयंकर मुखमंडल: उनके तीन नेत्र जलते हुए अंगारों के समान लाल हैं। मुख से दो बड़ी दाढ़ें ऊपर की ओर निकली हुई हैं, जिससे उनका मुख अत्यंत विकराल प्रतीत होता है। उनकी जिह्वा बाहर की ओर निकली हुई है और वे अट्टहास कर रही हैं। यह विकरालता अज्ञान और आसुरी वृत्तियों का नाश करने के लिए है।
दिव्य आभूषण: वे साधारण आभूषण धारण नहीं करतीं। उनके गले में ताजे कटे हुए नरमुंडों की माला है, जिससे रक्त टपक रहा है। वे अपनी कमर में शिशुओं के कटे हुए हाथों की करधनी पहने हुए हैं। उनके कंगन मृत शरीरों की नसों से बने हैं और कानों में शवों के कुंडल हैं । ये आभूषण इस सत्य का प्रतीक हैं कि वे भौतिक शरीर और संसार के समस्त मोह से परे हैं। जो साधक इस रहस्य को समझ लेता है, वह मृत्यु के भय से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
षोडश भुजाएँ एवं आयुध: उनकी सोलह भुजाएँ हैं, जिनमें वे खड्ग, त्रिशूल, चक्र, पाश, परशु, सर्प, धनुष, मुद्गर और रक्त से भरा खप्पर (नरकपाल) जैसे भयानक आयुध धारण करती हैं 11। उनका खड्ग 'ज्ञान' का प्रतीक है, जो साधक के 'अहंकार' रूपी सिर को काट देता है। अन्य अस्त्र-शस्त्र साधक के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं का समूल नाश करते हैं।
स्थान एवं आसन: वे श्मशान में जलती हुई चिता की प्रचंड अग्नि के मध्य एक विशाल शव के ऊपर खड़ी हैं। श्मशान वह स्थान है जहाँ अहंकार और आसक्ति राख हो जाते हैं। वह शव स्वयं शिव हैं, जो शक्ति के बिना निष्क्रिय (शव) हैं। माँ काली ही उनकी क्रिया-शक्ति हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में जीवन का संचार करती हैं।
यह स्वरूप साधक को यह स्मरण कराता है कि इस संसार की नश्वरता को स्वीकार कर, अपने अहंकार को चिता में भस्म करके ही परमतत्व को प्राप्त किया जा सकता है।
माँ कालकाली की उपासना-विधि
तंत्र शास्त्र एक अत्यंत गहन और गुह्य विज्ञान है। माँ कालकाली जैसे उग्र स्वरूपों की उपासना बिना किसी योग्य और सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन के कदापि नहीं करनी चाहिए। यह शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है। गुरु ही शिष्य की पात्रता, क्षमता और अधिकार को समझकर उसे सही मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
किंतु, जिन भक्तों के पास गुरु का सान्निध्य नहीं है, परंतु हृदय में सच्ची श्रद्धा और भक्ति है, उनके लिए शास्त्र भक्ति-मार्ग की सात्विक उपासना का विधान भी बताते हैं। माँ भाव की भूखी हैं, आडंबर की नहीं। एक सामान्य गृहस्थ भक्त निम्नलिखित सरल विधि से माँ की कृपा प्राप्त कर सकता है:
पवित्रता एवं तैयारी: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ लाल या काले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को शुद्ध कर माँ काली की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र और पूजा का उद्देश्य (जैसे- सांसारिक बाधाओं की निवृत्ति एवं माँ की कृपा प्राप्ति) बोलकर संकल्प लें और जल भूमि पर छोड़ दें।
दीप प्रज्वलन: घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो तो पूजा की अवधि तक 'अखंड ज्योत' जलाएं।
ध्यान: शास्त्रों में वर्णित माँ के स्वरूप का हृदय में ध्यान करें। उनसे प्रार्थना करें कि वे आपकी पूजा स्वीकार करने के लिए इस प्रतिमा में प्रतिष्ठित हों ।
मंत्र जप: रुद्राक्ष की माला पर माँ के मंत्र का अपनी श्रद्धानुसार (न्यूनतम एक माला अर्थात् 108 बार) जप करें।
नैवेद्य (भोग): माँ को फल, मिष्ठान्न, बताशे और लौंग का जोड़ा अर्पित करें। भाव से चढ़ाई गई कोई भी सात्विक वस्तु माँ सहर्ष स्वीकार करती हैं ।
पाठ: अपनी सुविधानुसार 'श्री काली चालीसा', 'दुर्गा सप्तशती' या माँ काली के स्तोत्रों का पाठ करें।
आरती एवं क्षमा प्रार्थना: अंत में कर्पूर से माँ की आरती करें और पूजा में जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा याचना करें ।
'महाकाल संहिता' में वर्णित तांत्रिक उपासना में 'पंचमकार' का विधान है, परंतु शास्त्रों में ही गृहस्थ साधकों के लिए इनके स्थान पर सात्विक अनुकल्प (जैसे- मद्य के स्थान पर नारियल का जल) और 'मानसोपचार पूजन' (मानसिक रूप से सभी वस्तुएं अर्पित करना) का विधान दिया गया है, जो पूर्ण फलदायी है।
परम शक्तिशाली मंत्र और उनका विज्ञान
मंत्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु शब्द-ब्रह्म का साक्षात् स्वरूप हैं। ये देवियों की चैतन्य शक्ति को अपने भीतर धारण करते हैं। 'महाकाल संहिता' में कालकाली और कामकला काली के अत्यंत शक्तिशाली मंत्रों का उल्लेख है।
कालकाली मंत्र:
नवकाली के अंतर्गत माँ कालकाली का विशिष्ट बीज मंत्र इस प्रकार है:
ॐ क्रीं हूं ह्रीं स्त्रीं क्लीं कालकाली फट् स्वाहा॥
यह मंत्र माँ के कालकाली स्वरूप की ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए है ।
| बीजाक्षर (Bija) | बीज का नाम | तात्विक अर्थ एवं प्रभाव |
|---|---|---|
| क्लीं | काम बीज | यह बीज साधक को भक्ति-मार्ग की ओर आकर्षित करता है तथा उसकी समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक कामनाओं की पूर्ति करता है। यह तीव्र आकर्षण शक्ति का प्रदाता है। |
| क्रीं | काली बीज | यह माँ काली की क्रिया-शक्ति का बीज है। यह साधक के कर्म, नकारात्मकता, शत्रु एवं समस्त बाधाओं का नाश कर उसे आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्रदान करता है। |
| हूं | क्रोध बीज | यह देवी के दिव्य क्रोध का बीज है, जो आध्यात्मिक प्रगति में बाधक समस्त आसक्तियों और मोह-माया के बंधनों का छेदन करता है। यह कर्मों का दहन कर चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। |
| क्रों | अंकुश बीज | यह अंकुश (नियंत्रण) का बीज है, जो समस्त मिथ्या और भ्रम का विनाश करता है। यह साधक की चेतना का दैवीय शक्ति के साथ एकीकरण कर उसे भौतिक आसक्ति से मुक्त करता है। |
| स्फ्रों | गुह्य बीज | यह एक अत्यंत गुह्य और शक्तिशाली बीज है, जिसका विशिष्ट प्रभाव और रहस्य केवल गुरु-शिष्य परंपरा में ही प्रकट किया जाता है। |
यह मंत्र केवल इच्छापूर्ति का साधन नहीं, अपितु आध्यात्मिक रूपांतरण का एक संपूर्ण विज्ञान है। यह साधक को आकर्षित करने से लेकर, उसकी शुद्धि करने, आसक्तियों को काटने और अंत में परमतत्व से एकाकार करने तक की पूरी यात्रा का सूत्र है।
