विस्तृत उत्तर
सनातन दर्शन में आत्मा, जीवात्मा और परमात्मा के बीच का संबंध गहन दार्शनिक चिंतन का विषय है। विभिन्न वेदांत परंपराओं में इसकी व्याख्या कुछ भिन्न है।
आत्मा — आत्मा प्रत्येक जीव का शुद्ध, सनातन, अजन्मा और अमर चेतन तत्व है। यह न जन्मती है, न मरती है। गीता (2.20) में कहा गया है — 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायम्' — यह आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है।
जीवात्मा — माया और अहंकार के कारण जब आत्मा शरीर में बंध जाती है और 'मैं यह शरीर हूँ' — इस भाव में फँस जाती है, तो वह जीवात्मा कहलाती है। जीवात्मा संसार से जुड़ी, कर्म करती और भोगती है।
परमात्मा — परमात्मा वह सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान चेतन तत्व है जो समस्त सृष्टि का आधार है। आत्मा और परमात्मा के संबंध पर शंकराचार्य का अद्वैत मत है — 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' — ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव भी ब्रह्म ही है। अर्थात आत्मा और परमात्मा मूलतः एक हैं।
रामानुज (विशिष्टाद्वैत) और मध्वाचार्य (द्वैत) की परंपरा में आत्मा और परमात्मा भिन्न माने जाते हैं और भक्ति के द्वारा जीव परमात्मा का सान्निध्य पाता है।
सरल शब्दों में — बूँद और सागर का संबंध जैसा है। बूँद सागर का ही अंश है, फिर भी वह अलग दिखती है। जब माया का पर्दा उठता है, तब जीव को बोध होता है कि वह परमात्मा से अलग नहीं है।





