विस्तृत उत्तर
भारतीय परंपरा में संगीत को भक्ति का सबसे सहज और स्वाभाविक माध्यम माना गया है। यह कोई संयोग नहीं कि भगवान कृष्ण स्वयं वंशी-वादक हैं और भगवान नारद वीणा लिए रहते हैं।
नवधा भक्ति में संगीत — नारद भक्ति सूत्र में नवधा भक्ति के नौ रूपों में 'कीर्तन' एक प्रमुख अंग है। कीर्तन भगवान के नाम और गुणों का गायन है। भागवत में कहा गया है — 'तन्नामसंकीर्तनमेव केवलम्' — कलियुग में नाम-संकीर्तन ही एकमात्र उपाय है।
संगीत और भाव-शुद्धि — शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ कहते हैं कि भजन-कीर्तन करने से मन के विकार, शोक, क्रोध और दुख का नाश होता है। जब भक्त भाव में डूबकर भगवान का भजन गाता है तो यह एक प्रकार का ध्यान है जिसमें मन पूरी तरह ईश्वर में लीन हो जाता है।
महान भक्तों का उदाहरण — मीराबाई ने गाते-गाते कृष्ण से मिलन पाया। सूरदास की कविताएँ भगवान को इतनी प्रिय हुईं कि उनके नेत्रहीन होने पर भी वे भगवान के दर्शन कर सके। कबीर, तुकाराम, नरसिंह मेहता — सभी महान संत-भक्त संगीत के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचे।
शिव का डमरू — भगवान शिव का डमरू जीवन की लय और नाद-ब्रह्म का प्रतीक है। योग शास्त्र कहता है — 'नाद ब्रह्म' — ध्वनि ही ईश्वर है। संगीत इसी नाद-ब्रह्म का अनुभव कराता है।





