विस्तृत उत्तर
भजन और कीर्तन केवल भावना का उद्गार नहीं हैं — ये चित्त-शुद्धि के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक उपकरण हैं।
ध्वनि और मस्तिष्क — जब हम भगवान का नाम लयबद्ध तरीके से उच्चारित करते हैं, तो उसकी ध्वनि-तरंगें मस्तिष्क की अल्फा तरंगों को सक्रिय करती हैं। इससे मन शांत और एकाग्र होता है। भजन में जब समूह में बैठकर एक ही भाव में गाया जाता है, तो सामूहिक ऊर्जा बनती है जो व्यक्तिगत मन के विकारों को शुद्ध करती है।
चित्त की परिभाषा — चित्त वह मन की परत है जहाँ संस्कार और वासनाएँ जमा रहती हैं। भजन-कीर्तन में जब मन भगवान के नाम में लीन होता है, तो धीरे-धीरे पुराने नकारात्मक संस्कारों पर नए दिव्य संस्कार बनते हैं। यही चित्त-शुद्धि है।
भागवत का संदेश — श्रीमद्भागवत में कहा गया है — 'जैसे अग्नि सुवर्ण के मल को नष्ट कर देती है, वैसे ही भक्तिपूर्वक किया गया कीर्तन सब पापों का नाश करता है।'
भाव की भूमिका — शास्त्र कहते हैं कि कीर्तन का फल भाव पर निर्भर है। रुदन के साथ, हर्ष के साथ, शांत भाव से — किसी भी भाव में किया कीर्तन फलदायी है। संत तुकाराम ने कहा — जब कीर्तन में अश्रु आएँ, समझो भगवान ने स्पर्श किया।





