हयग्रीवावतार
भगवान् हयग्रीव, अश्वमुखधारी विष्णु अवतार, ज्ञान और विद्या के प्रदाता माने जाते हैं। इनकी उपासना विशेष रूप से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और ज्ञान पिपासुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषद् और तंत्र दोनों में इनके मंत्रों का पाया जाना इनकी उपासना की व्यापकता को दर्शाता है। बीज मंत्र "ल्हौं" विशेष ध्यानाकर्षण करता है। हयग्रीव का अश्वमुख स्वरूप ज्ञान की तीव्र गति और शक्ति का प्रतीक है। मंत्रों में "मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ" (मेधा और प्रज्ञा प्रदान करें) का बार-बार आना इनके ज्ञान प्रदायक स्वरूप को पुष्ट करता है।
अ. हयग्रीव गायत्री:
ॐ वाणीश्वराय विद्महे, हयग्रीवाय धीमहि । तन्नो हयग्रीवः प्रचोदयात् ।
स्रोत: विभिन्न गायत्री संग्रहों में, जैसे "गायत्री महाविज्ञान"।
देवता: भगवान् हयग्रीव।
फलश्रुति: उत्साह, साहस, वीरता, शूरता, निर्भयता, कठिनाइयों से लड़ने की अभिलाषा, पुरुषार्थ की प्राप्ति।
विधि: सामान्य गायत्री जप विधि अनुसार, हयग्रीव देव का ध्यान करते हुए।
आ. हयग्रीवोपनिषद् के मंत्र:
हयग्रीवोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बंधित एक लघु उपनिषद् है जिसमें भगवान् हयग्रीव के विभिन्न मंत्रों और उनकी महिमा का वर्णन है।
मंत्र १ (२९ अक्षर):
ॐ श्रीं ह्लौं ॐ नमो भगवते हयग्रीवाय विष्णवे मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
मंत्र २ (२८ अक्षर):
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं ऐं ऐं क्लीं क्लीं सौः सौः ह्रीं ॐ नमो भगवते हयग्रीवाय मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
बीज मंत्र:
ल्हौं
अन्य मंत्र:
अमृतं कुरु कुरु स्वाहा। तथा ल्हौं सकल-साम्राज्येन सिद्धिं कुरु कuru स्वाहा।
स्रोत: हयग्रीवोपनिषद्।
देवता: भगवान् हयग्रीव।
फलश्रुति: श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराणों का ज्ञान; धन प्राप्ति; वाक् सिद्धि, ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि; जीवन में सुख एवं मृत्योपरांत मोक्ष; महावाक्यों का तात्विक ज्ञान। एकादशी तिथि को जप करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है । "ल्हौं" जैसे बीज मंत्र का उल्लेख इसे एक विशिष्ट तांत्रिक आयाम भी प्रदान करता है, जो शीघ्र फलदायक हो सकता है।
विधि: उपनिषद् में निर्दिष्ट विधि अनुसार।
