परशुरामावतार
भगवान् परशुराम, विष्णु के छठे आवेश अवतार हैं, जो अपने शौर्य, ब्रह्मतेज और अन्याय के प्रतिकार के लिए जाने जाते हैं। उनके मंत्र साधक को अन्याय के विरुद्ध लड़ने की शक्ति, आत्मबल और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। "रां" बीजमंत्र उनकी उग्र शक्ति का द्योतक है। "ब्रह्मक्षत्राय" शब्द उनके ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्व दोनों गुणों को एक साथ दर्शाता है, जो शास्त्र और शस्त्र दोनों में उनकी निपुणता का प्रतीक है। परशुराम का चरित्र ही उग्रता और न्याय-स्थापना से जुड़ा है, अतः उनके मंत्र शत्रुनाश और आत्मरक्षा में प्रभावी हो सकते हैं। "रां" अग्नि बीज (रं˙) का एक रूप हो सकता है, जो तेज, पराक्रम और विनाश की शक्ति से सम्बंधित है। गायत्री मंत्रों में "जामदग्न्याय" (जमदग्नि के पुत्र) और "महावीराय" उनके वंश और पराक्रम को इंगित करते हैं, जबकि "ब्रह्मक्षत्राय" और "क्षत्रियान्ताय" उनके दोहरे स्वरूप और धर्म-स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं।
अ. परशुराम गायत्री मंत्र १:
ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्॥
आ. परशुराम गायत्री मंत्र २:
ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्॥
इ. परशुराम बीज मंत्र युक्त मंत्र:
ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:॥
ई. परशुराम मूल मंत्र:
ॐ परशुरामाय नमः।
उ. परशुराम मंत्र (अन्य):
ॐ ह्रीं क्लीं परशुरामाय नमः।
देवता:
भगवान् परशुराम।
फलश्रुति:
इन मंत्रों के जाप से सर्वकामना सिद्धि, जीवन की समस्त समस्याओं का निवारण, सत्य एवं साहस की प्राप्ति, वीरता, मानसिक दृढ़ता, क्रोध पर नियंत्रण, आत्मविश्वास में वृद्धि और शांति प्राप्त होती है ।
विधि-विधान:
अक्षय तृतीया के दिन इन मंत्रों का जप विशेष फलदायी होता है। जप-ध्यान करने के बाद दशांश हवन पायस-घृत (खीर और घी) से करना चाहिए । सामान्यतः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुश, ऊन या सूती आसन पर बैठकर रुद्राक्ष या तुलसी माला से १०८ बार या अधिक जप करना चाहिए।
