विस्तृत उत्तर
भगवान कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है कि वे सबके हृदय में विराजमान हैं और सबके उद्धार के लिए सदा तत्पर हैं। वे 'नाराज' नहीं होते — परंतु जब हम उनसे दूर जाते हैं तो जीवन में वह प्रेम, शांति और सहजता गायब हो जाती है जो उनकी कृपा से मिलती है।
जीवन में संकेत — जब जीवन में संबंधों में कड़वाहट आ जाए, प्रेम और विश्वास टूटने लगे, हर कार्य में 'मैं ही कर रहा हूँ' का अहंकार बढ़े, और जीवन बोझिल और नीरस लगने लगे — तब समझना चाहिए कि कृष्ण से दूरी बन रही है।
भक्ति में शिथिलता — जब कृष्ण के भजन सुनकर भाव न जागे, श्रीमद्भागवत सुनने की इच्छा न हो, मंदिर में जाने की रुचि समाप्त हो — यह भी एक प्रकार की दूरी के संकेत हैं।
गीता का संदेश — कृष्ण कहते हैं (गीता 9.29) — 'समोऽहं सर्वभूतेषु' — मैं सबमें समान रूप से हूँ। जो मुझे याद नहीं करता, वह मुझसे दूर नहीं जाता — मैं दूर नहीं जाता — परंतु वह मेरी कृपा से वंचित रह जाता है।
उपाय — 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जप, गीता का नित्य अध्ययन, किसी एक अध्याय का पाठ, और मन से क्षमायाचना करके पुनः भक्ति में लग जाएँ।





