विस्तृत उत्तर
जब हृदय गहरे दुख में डूबा हो, तब भगवान सबसे निकट होते हैं — यह बात सभी भक्त-कवियों और शास्त्रों ने कही है। भगवान को 'मनाना' नहीं पड़ता — उन तक पहुँचना पड़ता है, और उस पहुँच का रास्ता दुख के समय सबसे खुला होता है।
पहली बात — भगवान के सामने रोएँ — संकोच बिल्कुल न करें। जैसे बच्चा माँ के सामने रोता है — वैसे ही। भगवान के आगे अपना दुख कहें, शिकायत करें, जो मन में हो वो बोलें। ईश्वर किसी की आहत न हों, और अगर हम उनसे छिपाएँ तो दूरी बढ़ती है।
नाम-जप करें — दुख में किसी जटिल मंत्र की आवश्यकता नहीं। 'राम राम', 'ओम नमः शिवाय', 'हरे कृष्ण' — अपने इष्टदेव का नाम बार-बार जपें। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा — 'दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय' — दुख के समय का जप सबसे शक्तिशाली होता है।
भगवद गीता का संदेश — श्रीकृष्ण ने कहा — 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥' — 'सब कुछ छोड़कर केवल मेरी शरण आओ, मैं तुम्हें मुक्त करूँगा — शोक मत करो।' यह भगवान का स्वयं का वचन है।
शरण का भाव — 'प्रपत्ति' या शरणागति — भगवान को पूरी तरह सौंप देना — यह दुख के समय का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। 'मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो' — यह विश्वास मजबूत करें।
भजन-कीर्तन सुनें — दुख के समय भजन सुनना मन को ऊपर उठाता है। भगवान के नाम में एक जादू है — यह विज्ञान नहीं, अनुभव की बात है।
प्रकृति में जाएँ — जंगल, नदी, पहाड़ — यहाँ भगवान साक्षात हैं। खुली हवा और प्रकृति में समय बिताना दुख को हल्का करता है।
याद रखें — भगवान दुख के कारण नहीं हैं। वे उस दुख में भी आपके साथ हैं। प्रह्लाद को यातनाएँ मिलीं, शबरी को वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ी, कुंती को अनगिनत कष्ट हुए — फिर भी ईश्वर ने हर एक का साथ नहीं छोड़ा। आपका भी नहीं छोड़ेगा।





