विस्तृत उत्तर
यह मानव जाति का सबसे पुराना और सबसे गहरा प्रश्न है। हिंदू दर्शन में इस प्रश्न का कभी एक सरल और एकमत उत्तर नहीं रहा — बल्कि इसे सदैव जिज्ञासापूर्वक खोजा गया है।
तर्क-आधारित दृष्टिकोण — न्याय-दर्शन (महर्षि गौतम का दर्शन) में ईश्वर के अस्तित्व के लिए तर्क दिया गया है कि 'कारण के बिना कार्य संभव नहीं' — इस विश्व का इतना विशाल और सुव्यवस्थित कार्य किसी कारण के बिना नहीं हो सकता, वह कारण ईश्वर है। उदयनाचार्य ने 'न्यायकुसुमांजलि' में इस तर्क को विस्तार से सिद्ध किया।
व्यावहारिक अनुभव — करोड़ों मनुष्यों का जीवन-अनुभव है कि जब संकट में वे भगवान से प्रार्थना करते हैं तो कुछ न कुछ बदलता है, कोई मार्ग निकलता है। यह व्यक्तिगत अनुभव-प्रमाण किसी वैज्ञानिक प्रयोग से सिद्ध नहीं होता, परंतु करोड़ों लोगों का एक जैसा अनुभव अपने आप में एक प्रकार का साक्ष्य है।
वेदांत का उत्तर — अद्वैत वेदांत के अनुसार ईश्वर को 'सिद्ध' करने की जरूरत नहीं क्योंकि वह तो स्वयं हर चीज में है — 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — यह सब ब्रह्म ही है। ईश्वर का प्रमाण बाहर नहीं, भीतर है।
यह भी जानना जरूरी — हिंदू दर्शन में चार्वाक, जैन और बौद्ध जैसे दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते। हिंदू धर्म की विशेषता यही है कि वह इस प्रश्न पर खुली बहस का स्वागत करता है।





