विस्तृत उत्तर
भगवान शिव का स्वरूप और उनकी कथाएँ जीवन जीने की सर्वोच्च शिक्षाएँ हैं। उनका पूरा व्यक्तित्व ही एक जीती-जागती जीवन-दर्शन की पाठशाला है।
विषपान की शिक्षा — समुद्र मंथन में जब हलाहल विष निकला जो सम्पूर्ण सृष्टि को नष्ट कर देता, तब शिव ने उसे पी लिया और नीलकंठ बन गए। शिक्षा — समाज की तकलीफें खुद झेलो, दूसरों को उससे बचाओ। वास्तविक महानता दूसरों के कष्ट अपने ऊपर लेने में है।
वैराग्य की शिक्षा — शिव के पास धन नहीं, महल नहीं, श्मशान में रहते हैं, भस्म लपेटते हैं — फिर भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। शिक्षा — आनंद और संपन्नता बाहरी वस्तुओं में नहीं, आत्मा की शांति में है।
क्षमा की शिक्षा — भस्मासुर, रावण जैसे दुष्ट भी जब शिव की शरण में आए तो उन्होंने वरदान दिया। शिक्षा — कोई भी जीव अक्षम्य नहीं। भक्ति के सामने शत्रु-मित्र का भेद नहीं।
योग और संतुलन की शिक्षा — शिव एक ओर घोर तपस्वी हैं, दूसरी ओर पार्वती के प्रेमी पति। एक ओर महाकाल हैं, दूसरी ओर भोलेनाथ। शिक्षा — जीवन में सभी पहलुओं का संतुलन सबसे बड़ा योग है।




