विस्तृत उत्तर
आधुनिक जीवन में ईश्वर से जुड़ाव बनाना कठिन लगता है, परंतु शास्त्रों में बताए मार्ग आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
दैनिक जीवन में स्मरण — संत कबीर ने कहा था — 'सुमिरन की सुधि यूँ करो ज्यों गागर पनिहार' — जैसे पनिहारिन सिर पर घड़ा उठाए सारे काम करती है और घड़ा नहीं गिरता, वैसे ही रोजमर्रा के काम करते हुए भगवान का स्मरण रखो। खाना बनाते, चलते, कार चलाते — कहीं भी 'राम-राम' या अपने इष्ट का नाम लेते रहें।
कृतज्ञता का भाव — सुबह उठकर एक मिनट के लिए वह सब सोचें जिसके लिए आप आभारी हैं — स्वास्थ्य, परिवार, काम। यह कृतज्ञता ही सच्ची भक्ति का आरंभ है।
प्रकृति में ईश्वर देखें — जब बारिश हो, सूर्यास्त हो या रात को तारे दिखें — क्षण भर रुककर उस सुंदरता को महसूस करें। गीता में कहा है — यह समस्त विश्व मेरा ही विस्तार है।
सेवा को भक्ति बनाएँ — 'नरसेवा ही नारायण सेवा है।' किसी की मदद करना, किसी को खाना देना — यह सब ईश्वर से जुड़ाव है।
एकांत में बैठें — दिन में 5-10 मिनट मोबाइल बंद करके शांत बैठें और भीतर झाँकें। यह ध्यान है जो ईश्वर से सीधा संवाद करने का अभ्यास है।





